Search

    Language Settings
    Select Website Language

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policy, and Terms of Service.

    चुनाव आयोग का बड़ा यू-टर्न: फॉर्म-6 से हटाया SIR का विवादित घोषणा पत्र, दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बाद बदला फैसला

    10 hours ago

    Yugcharan News / 04-11-2026

    नई दिल्ली: भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) ने मतदाता पंजीकरण से जुड़े फॉर्म-6 में बड़ा बदलाव करते हुए विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) से संबंधित विवादित घोषणा पत्र को ऑनलाइन आवेदन से अलग कर दिया है। आयोग के ECINet पोर्टल पर अब नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में SIR से जुड़ा घोषणा पत्र अनिवार्य रूप से शामिल नहीं है। यह फैसला उन राज्यों में भी लागू किया गया है, जहां SIR की प्रक्रिया अभी जारी है। इस कदम को आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों द्वारा उठाई गई कानूनी आपत्तियों के बाद एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।

    यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले कई महीनों से फॉर्म-6 में SIR घोषणा पत्र को शामिल किए जाने पर आपत्ति जताई थी। उनका तर्क था कि फॉर्म-6 एक वैधानिक दस्तावेज है, जिसे Registration of Electors Rules, 1960 के तहत निर्धारित किया गया है। इसमें बदलाव करने का अधिकार निर्वाचन आयोग के बजाय केंद्र सरकार के पास है। इसके बावजूद ऑनलाइन आवेदन में यह घोषणा जोड़ी गई थी।

    द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर 2026 को प्रकाशित पड़ताल के लगभग पांच सप्ताह बाद आयोग ने इस व्यवस्था को बदल दिया है। इससे पहले दोनों चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में आयोग के विभिन्न फैसलों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को लेकर 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं।

    फॉर्म-6 से क्या हटाया गया?

    फॉर्म-6 का इस्तेमाल नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए किया जाता है। पहले ECINet पोर्टल पर उपलब्ध इसके ऑनलाइन संस्करण में सेक्शन J और K के बीच SIR से संबंधित एक अतिरिक्त घोषणा शामिल की गई थी।

    इस घोषणा के तहत आवेदन करने वाले व्यक्ति को तीन विकल्पों में से एक का चयन करना अनिवार्य था।

    पहले विकल्प में आवेदक को यह बताना होता था कि क्या उसका नाम 2000 के शुरुआती वर्षों में हुए पिछले विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण के दौरान प्रकाशित मतदाता सूची में शामिल था।

    दूसरे विकल्प में यह जानकारी मांगी जाती थी कि क्या आवेदक के माता-पिता या दादा-दादी में से किसी का नाम उस समय की मतदाता सूची में दर्ज था।

    तीसरे विकल्प में आवेदक को यह बताना होता था कि न तो उसका अपना नाम और न ही उसके माता-पिता का नाम उस पुरानी मतदाता सूची में मौजूद था।

    इस घोषणा को भरना अनिवार्य था। जब तक आवेदक इन तीन विकल्पों में से किसी एक का चयन नहीं करता, तब तक वह ऑनलाइन आवेदन की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ा सकता था।

    अब निर्वाचन आयोग ने इस घोषणा को फॉर्म-6 से अलग कर दिया है। ECINet पोर्टल पर यह एक स्वतंत्र दस्तावेज के रूप में उपलब्ध है। इसका मतलब है कि नए मतदाता के पंजीकरण के लिए निर्धारित वैधानिक फॉर्म और SIR से संबंधित घोषणा को अलग-अलग रखा गया है।

    सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने उठाए थे कानूनी सवाल

    फॉर्म-6 में SIR घोषणा शामिल करने को लेकर दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां कई महीने पुरानी हैं।

    चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने 16 मई 2026 को अपनी टिप्पणी में स्पष्ट किया था कि फॉर्म-6 में इस तरह का बदलाव संबंधित कानूनी संशोधन के बिना नहीं किया जा सकता।

    इसके बाद 19 मई को चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने भी इस आपत्ति का समर्थन किया।

    13 अगस्त को संधू ने इस बदलाव को स्पष्ट रूप से 'अनधिकृत और अवैध' बताते हुए इसे तत्काल हटाने की मांग की थी। उनका कहना था कि निर्वाचन आयोग अपने स्तर पर नियमों के तहत निर्धारित वैधानिक फॉर्म में इस तरह का बदलाव नहीं कर सकता।

    हालांकि, दोनों आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद जुलाई में ऑनलाइन फॉर्म-6 में यह घोषणा शामिल कर दी गई थी। द इंडियन एक्सप्रेस ने 12 जुलाई को सबसे पहले इस बदलाव की जानकारी प्रकाशित की थी।

    23 सितंबर को प्रकाशित अपनी विस्तृत जांच रिपोर्ट में अखबार ने बताया कि दोनों आयुक्तों ने इस व्यवस्था को लेकर बार-बार आपत्ति दर्ज कराई थी। उस समय तक घोषणा ऑनलाइन फॉर्म में मौजूद थी।

    आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में क्या कहा?

    इस मामले में महत्वपूर्ण घटनाक्रम 26 अक्टूबर 2026 को सामने आया, जब निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाबी हलफनामा दाखिल किया।

    हलफनामे के अनुसार, आयोग के इलेक्टोरल रोल (ER) डिवीजन ने 21 अक्टूबर को फॉर्म-6 और SIR घोषणा को अलग-अलग करने का फैसला लिया था।

    आयोग ने अपने जवाब में बताया कि शुरुआत में SIR घोषणा को फॉर्म-6 के साथ जोड़ने का उद्देश्य आवेदन प्रक्रिया को आसान बनाना था। यदि दोनों दस्तावेज अलग-अलग जमा किए जाते, तो आवेदक को दो अलग-अलग वन टाइम पासवर्ड (OTP) और दो ई-सिग्नेचर की जरूरत पड़ती।

    एक ही ऑनलाइन फॉर्म में दोनों को शामिल करने से आवेदक को केवल एक OTP और एक ई-सिग्नेचर की आवश्यकता होती। आयोग के अनुसार, इसी उद्देश्य से दोनों को एक साथ प्रदर्शित किया गया था।

    हालांकि, आयोग ने माना कि इस व्यवस्था को लेकर विचार-विमर्श और सुझाव सामने आए। इसके बाद 21 अक्टूबर को ER डिवीजन ने फैसला किया कि ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया भी भौतिक आवेदन की तरह दो हिस्सों में होगी।

    हलफनामे में कहा गया कि पहला हिस्सा नियमों के तहत निर्धारित फॉर्म-6 होगा, जबकि दूसरा हिस्सा SIR से संबंधित घोषणा पत्र होगा।

    इसके बाद ECINet पोर्टल पर दोनों दस्तावेज अलग-अलग कर दिए गए।

    आयोग ने पहले भी बदला था अपना रुख

    फॉर्म-6 को लेकर निर्वाचन आयोग का यह तीसरा रुख था, जो लगभग छह सप्ताह के भीतर सामने आया।

    23 सितंबर को द इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल प्रकाशित होने के बाद आयोग ने उसी दिन एक प्रेस नोट जारी किया था। हालांकि, उस प्रेस नोट में फॉर्म-6 में SIR घोषणा को शामिल करने से जुड़े विवाद का सीधे तौर पर उल्लेख नहीं किया गया था।

    आयोग ने कहा था कि उसके सभी कदम कानूनों और आयोग के निर्देशों के अनुरूप हैं। साथ ही, दोनों चुनाव आयुक्तों की टिप्पणियों को सामान्य प्रशासनिक सुझाव और प्रारंभिक स्तर पर उठाए गए सवाल बताया गया था।

    26 सितंबर को पूर्ण निर्वाचन आयोग की बैठक हुई। इसके बाद जारी दूसरे बयान में फॉर्म-6 के संबंध में कहा गया कि SIR के लिए जोड़ी गई घोषणा को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है और SIR से बाहर की अवधि में नियमों के अनुसार निर्धारित फॉर्म इस्तेमाल किए जाएंगे।

    इस व्यवस्था के तहत जिन राज्यों में SIR पूरा हो चुका था, वहां ऑनलाइन फॉर्म-6 से घोषणा हटा दी गई थी। लेकिन दिल्ली और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में, जहां SIR की प्रक्रिया जारी थी, घोषणा फॉर्म का हिस्सा बनी हुई थी।

    इसके बाद 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने संशोधित फॉर्म-6 को न तो मंजूरी दी थी और न ही उसे खारिज किया था।

    अंततः 21 अक्टूबर को ER डिवीजन ने घोषणा को सभी राज्यों में फॉर्म-6 से अलग करने का निर्णय लिया। अब यह बदलाव ECINet पोर्टल पर लागू हो चुका है।

    हलफनामे में आयोग ने क्या स्वीकार किया?

    निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में यह दावा बरकरार रखा कि आयोग ने औपचारिक रूप से फॉर्म-6 में कोई संशोधन नहीं किया था।

    आयोग के अनुसार, SIR से संबंधित आदेशों के माध्यम से फॉर्म-6 में कोई वैधानिक बदलाव नहीं किया गया था।

    हालांकि, हलफनामे में यह भी स्वीकार किया गया कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर फॉर्म-6 और SIR घोषणा को जिस तरीके से प्रदर्शित किया गया था, उससे यह गलतफहमी पैदा हो सकती थी कि निर्वाचन आयोग ने फॉर्म-6 में संशोधन कर दिया है।

    आयोग ने कहा कि फॉर्म-6 में संशोधन करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है।

    यह स्वीकारोक्ति महत्वपूर्ण है, क्योंकि दोनों चुनाव आयुक्तों की मूल आपत्ति भी यही थी कि वैधानिक नियमों के तहत निर्धारित फॉर्म में बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के बदलाव नहीं किया जा सकता।

    10 महीनों में 14 बार उठीं आपत्तियां

    द इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के फैसलों और कामकाज से जुड़े मुद्दों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं।

    इन आपत्तियों का संबंध केवल फॉर्म-6 तक सीमित नहीं था। इनमें मतदाता पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और दोबारा जोड़ने, अपील की प्रक्रिया तथा मतदाता सूची के प्रबंधन के लिए इस्तेमाल होने वाले सॉफ्टवेयर जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल थे।

    दोनों आयुक्तों ने आयोग के आंतरिक प्रशासनिक कामकाज पर भी सवाल उठाए थे।

    रिपोर्ट के अनुसार, 28 जुलाई को एक प्रशासनिक आदेश के जरिए वरिष्ठ अधिकारियों के बीच काम का बंटवारा बदला गया था। इसमें सूचना प्रौद्योगिकी (IT) से संबंधित फाइलों का आवंटन भी शामिल था। दोनों आयुक्तों का आरोप था कि इस प्रक्रिया में उनसे परामर्श नहीं किया गया।

    इसके बाद दोनों ने अलग-अलग कैबिनेट सचिव को पत्र लिखे और अगले दिन संयुक्त रूप से उस आदेश को निरस्त कर दिया।

    रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि दोनों आयुक्तों की 14 में से पांच टिप्पणियों की प्रतियां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भेजी गई थीं। हालांकि, उन पर उनकी ओर से किसी जवाब का रिकॉर्ड सामने नहीं आया।

    ECINet और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में हुए अन्य बदलाव

    फॉर्म-6 के अलावा आयोग ने पिछले पांच सप्ताह के दौरान कई अन्य प्रशासनिक और तकनीकी मुद्दों पर भी बदलाव किए हैं।

    बैठकों की प्रक्रिया में बदलाव: अब आयोग की प्रत्येक बैठक से पहले एजेंडा साझा करने और बैठक के बाद कार्यवाही का विवरण जारी करने की व्यवस्था की गई है। दोनों आयुक्तों ने पहले शिकायत की थी कि इन प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया जा रहा था।

    विदेश यात्राओं पर नियंत्रण: आयोग के अधिकारियों की विदेश यात्राओं के लिए अब आयोग की मंजूरी आवश्यक होगी। पहले इस संबंध में भी आपत्तियां दर्ज कराई गई थीं।

    नई IT प्रणालियों की मंजूरी: महानिदेशक (IT) सीमा खन्ना के अधीन विकसित किए जा रहे नए IT मॉड्यूल और पोर्टल को पहले अधिकारियों की समिति और उसके बाद आयोग की मंजूरी के लिए प्रस्तुत करने की व्यवस्था की गई है।

    ECINet का ऑडिट: 14 अक्टूबर को एक समिति गठित की गई, जिसे ECINet की संबंधित कानूनों और नियमों के अनुरूप कार्यप्रणाली की जांच करनी है। इस समिति में वरिष्ठ चुनाव अधिकारी, चार मुख्य निर्वाचन अधिकारी और IIT बॉम्बे तथा IISc बेंगलुरु के दो स्वतंत्र विशेषज्ञ शामिल हैं।

    विवेक जोशी ने 29 मई को ECINet के ऑडिट की मांग की थी। उन्होंने मतदाता सूची के डेटाबेस के धीरे-धीरे केंद्रीकृत होने को लेकर चिंता जताई थी। संधू ने भी जुलाई और अगस्त में इस प्रस्ताव का समर्थन किया था।

    मतदाताओं और जमीनी अधिकारियों को लेकर भी बदले नियम

    आयोग ने ECINet सॉफ्टवेयर के माध्यम से जमीनी स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों के अधिकारों और प्रक्रियाओं में भी कुछ बदलाव किए हैं।

    महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी एस. चोकलिंगम ने 24 सितंबर को कुछ बदलावों की मांग की थी, जिन्हें अब लागू कर दिया गया है।

    इनमें मतदाताओं की व्यक्तिगत सुनवाई से संबंधित प्रक्रिया में बदलाव शामिल है। जिन मतदाताओं को मैपिंग में गड़बड़ी या तार्किक विसंगतियों के कारण नोटिस जारी किए जाते हैं, उनके मामलों में अब व्यक्तिगत सुनवाई को अपवाद के रूप में रखा गया है। इसके बजाय बूथ लेवल अधिकारियों को घर जाकर दस्तावेज एकत्र करने की व्यवस्था की गई है।

    इसके अतिरिक्त मतदाताओं को निर्धारित 13 श्रेणियों के बाहर के दस्तावेज जमा करने की अनुमति भी दी गई है।

    इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) अब तार्किक विसंगतियों से जुड़े मामलों पर स्वयं निर्णय ले सकते हैं। पहले ऐसे मामलों को जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO) के पास भेजने की व्यवस्था थी।

    पुरानी SIR मतदाता सूची के अंश को अनिवार्य रूप से अपलोड करने की शर्त भी हटा दी गई है।

    गोवा के 97 मतदाताओं का मामला भी सामने आया

    द इंडियन एक्सप्रेस की जांच में गोवा के 97 मतदाताओं का मामला भी उजागर हुआ था।

    रिपोर्ट के मुताबिक, इन मतदाताओं के नाम प्रारंभिक मतदाता सूची से हटा दिए गए थे। बाद में उन्होंने आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत किए और स्थानीय इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन अधिकारियों ने उनके मामलों की जांच के बाद नाम बहाल करने की मंजूरी दे दी।

    हालांकि, ECINet सॉफ्टवेयर में नाम हटाए जाने के फैसले को पलटने का विकल्प उपलब्ध नहीं था। इसके कारण स्थानीय अधिकारियों के पास मंजूरी देने के बावजूद इन मतदाताओं के नाम अंतिम सूची में शामिल कराने का तकनीकी विकल्प नहीं था।

    गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने सात दिनों के भीतर दिल्ली स्थित आयोग को आठ पत्र लिखे थे। इन पत्रों की प्रतियां महानिदेशक (IT) सीमा खन्ना को भी भेजी गई थीं।

    अब आयोग ने गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को इन मतदाताओं के नाम शामिल कराने की प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया है।

    सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे के अनुसार, 97 में से 88 मतदाताओं ने फॉर्म-6 भर दिया है और उनके आवेदन स्वीकार कर लिए गए हैं। छह मतदाता देश से बाहर हैं, जबकि तीन के पास पुर्तगाली पासपोर्ट हैं।

    आगे क्या होगा?

    निर्वाचन आयोग ने उन राज्यों में भी मतदाता पंजीकरण बढ़ाने के लिए विशेष अभियान चलाने के निर्देश दिए हैं, जहां SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। 29 सितंबर को जारी निर्देश के तहत मतदाता सूची में छूट गए लोगों को शामिल करने के लिए विशेष अभियान चलाया जाना है।

    इसके अलावा, आयोग ने 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (Special Summary Revision) की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया है। इसका मुख्य उद्देश्य वर्ष 2027 में 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले युवाओं को मतदाता सूची में शामिल करने की तैयारी करना है।

    इस प्रक्रिया के दौरान फॉर्म-6 भरने वाले नए आवेदकों को SIR से संबंधित घोषणा पत्र भरने की आवश्यकता नहीं होगी।

    कुल मिलाकर, फॉर्म-6 से SIR घोषणा को अलग करने का फैसला निर्वाचन आयोग के भीतर पिछले कई महीनों से चल रही प्रशासनिक और कानूनी असहमति के बीच एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। हालांकि, आयोग ने अपने हलफनामे में किसी भी मूल निर्णय को गलत मानने से इनकार किया है और बदलावों को प्रशासनिक प्रक्रियाओं में सुधार के तौर पर पेश किया है।

    यह मामला अब केवल एक ऑनलाइन फॉर्म में बदलाव तक सीमित नहीं रह गया है। इससे मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया, आयोग की तकनीकी प्रणालियों पर नियंत्रण, चुनाव आयुक्तों की भूमिका और वैधानिक अधिकारों के इस्तेमाल जैसे व्यापक सवाल भी सामने आए हैं। आगामी दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आयोग के इन बदलावों का मतदाता पंजीकरण और SIR की शेष प्रक्रिया पर क्या प्रभाव पड़ता है।

    Click here to Read More
    Previous Article
    अग्निवीरों के लिए बड़ी खुशखबरी: केंद्र सरकार ने बढ़ाई सेवा अवधि, अब चार साल के बजाय छह साल तक मिलेगा सेवा का मौका
    Next Article
    नवंबर की शुरुआत में दिल्ली की हवा हुई और जहरीली, आठ इलाकों में AQI 400 के पार; जहांगीरपुरी सबसे प्रदूषित

    Related देश Updates:

    Are you sure? You want to delete this comment..! Remove Cancel

    Comments (0)

      Leave a comment