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    रिकॉर्ड निचले स्तर पर रुपया आर्थिक सर्वेक्षण ने बताई बड़ी वजह

    2 days ago

    आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 ने साफ किया है कि सेवाओं और प्रवासी धन (रेमिटेंस) से मिलने वाला शुद्ध व्यापार अधिशेष, वस्तु व्यापार घाटे की भरपाई करने में नाकाफ़ी साबित हो रहा है। इसी कारण रुपये की स्थिरता पर दबाव बढ़ा है। यह टिप्पणी ऐसे दिन आई, जब रुपया गिरकर 91.98 प्रति अमेरिकी डॉलर के अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुँच गया।

    सर्वेक्षण के मुताबिक, रुपये पर सबसे बड़ा दबाव विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की लगातार निकासी से आया है। जनवरी में अब तक करीब 4 अरब डॉलर की निकासी हो चुकी है, जबकि 2025 में कुल निकासी 11.8 अरब डॉलर तक पहुँच गई है। रिपोर्ट में कहा गया कि भारत को भुगतान संतुलन बनाए रखने के लिए विदेशी पूंजी प्रवाह पर निर्भर रहना पड़ता है, और जब यह प्रवाह सूखने लगता है तो रुपये की स्थिरता सबसे पहले प्रभावित होती है।

     

    हालाँकि सर्वेक्षण ने यह भी जोड़ा कि रुपये का मौजूदा मूल्यांकन भारत की मज़बूत आर्थिक बुनियाद को पूरी तरह नहीं दर्शाता। आर्थिक वृद्धि मजबूत है, महँगाई नियंत्रण में है और कृषि व मानसून का परिदृश्य सकारात्मक बना हुआ है। लेकिन इस बीच अमेरिका द्वारा लगाए गए 50 प्रतिशत शुल्क से निर्यात पर दबाव बढ़ने की आशंका है, जिससे आने वाले महीनों में रुपये पर चुनौतियाँ और गहरी हो सकती हैं।

     

    आगे की चुनौती निर्यात और पूंजी प्रवाह की कसौटी

     

    आर्थिक सर्वेक्षण के संकेतों से साफ है कि आने वाले समय में रुपये की दिशा काफी हद तक वैश्विक पूंजी प्रवाह और निर्यात की स्थिति पर निर्भर करेगी। अमेरिका द्वारा ऊँचे शुल्क लगाए जाने से नए निर्यात ऑर्डर रुकने की बात सामने आ रही है, जो विदेशी मुद्रा आय पर दबाव बढ़ा सकती है। यदि एफपीआई निकासी का रुझान जारी रहता है और निर्यात में सुस्ती आती है, तो रुपये पर दबाव बना रह सकता है। ऐसे में नीति निर्माताओं के सामने चुनौती होगी कि वे निवेशकों का भरोसा कायम रखें, निर्यात को सहारा दें और बाहरी झटकों के बीच आर्थिक स्थिरता बनाए रखें।

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