Yugcharan News / 30-10-2026
देश की राजधानी दिल्ली में बढ़ते वायु प्रदूषण और दिवाली के दौरान पटाखों से होने वाले नुकसान को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया है। अदालत ने कहा है कि लोगों को पटाखामुक्त दिवाली मनाने के लिए जागरूक करने के अभियान में विराट कोहली जैसे लोकप्रिय क्रिकेटरों और अन्य प्रतिष्ठित हस्तियों की मदद ली जा सकती है। अदालत का मानना है कि खेल जगत और सार्वजनिक जीवन में लोकप्रियता रखने वाली हस्तियां आम लोगों को पर्यावरण संरक्षण का संदेश प्रभावी तरीके से दे सकती हैं। यह सुझाव पटाखों के इस्तेमाल, उनके निर्माण और बिक्री पर नियंत्रण से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि हर साल पटाखों और प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए निर्देश जारी किए जाते हैं, लेकिन इसके बावजूद नियमों का उल्लंघन जारी रहता है। अदालत ने सवाल उठाया कि जब बार-बार प्रतिबंध और दिशानिर्देश लागू करने के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहे हैं, तो क्या जनजागरूकता के लिए कोई अलग और प्रभावी तरीका नहीं अपनाया जा सकता।
इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी वराले की पीठ कर रही थी। पीठ ने विशेष रूप से दिल्ली में प्रदूषण की गंभीर स्थिति को देखते हुए लोकप्रिय हस्तियों को जागरूकता अभियान से जोड़ने का सुझाव दिया।
विराट कोहली जैसे क्रिकेटरों से मदद लेने का सुझाव
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी वराले ने कहा कि सरकार और संबंधित एजेंसियां ऐसे लोकप्रिय व्यक्तित्वों की सेवाएं क्यों नहीं ले सकतीं, जिन्हें समाज के विभिन्न वर्गों में सम्मान प्राप्त है।
उन्होंने सुझाव दिया कि अच्छे खिलाड़ियों और सार्वजनिक जीवन की प्रतिष्ठित हस्तियों को लोगों के बीच जागरूकता फैलाने के लिए आगे लाया जा सकता है।
न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश ने विशेष रूप से विराट कोहली जैसे लोकप्रिय क्रिकेटरों का उदाहरण देते हुए कहा कि दिल्ली में लोगों को पटाखामुक्त दिवाली मनाने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से ऐसे खिलाड़ियों से अनुरोध किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि लोकप्रिय क्रिकेटर इस तरह का संदेश देने में मदद कर सकते हैं कि दिवाली रोशनी का त्योहार है और इसे खुशियों तथा उत्साह के साथ मनाया जाना चाहिए।
अदालत की टिप्पणी का मुख्य उद्देश्य यह था कि लोगों को केवल प्रतिबंधों और कानूनी कार्रवाई के माध्यम से नियंत्रित करने के बजाय उन्हें स्वयं प्रदूषण कम करने के लिए प्रेरित किया जाए।
हालांकि, अदालत ने विराट कोहली को कोई औपचारिक जिम्मेदारी नहीं सौंपी है और न ही उनके अभियान में शामिल होने की पुष्टि हुई है। यह सुझाव सरकार और संबंधित अधिकारियों के लिए एक संभावित जनजागरूकता रणनीति के रूप में सामने आया है।
सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों पर प्रतिबंध के असर पर उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि हर साल पटाखों के इस्तेमाल को नियंत्रित करने के लिए आदेश दिए जाने के बावजूद प्रदूषण की समस्या क्यों बनी रहती है।
अदालत का मानना था कि केवल प्रतिबंध लगाने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल पा रहा है। यदि लोग नियमों का पालन नहीं करते हैं और बाजार में प्रतिबंधित पटाखों की बिक्री जारी रहती है, तो ऐसे आदेशों का वास्तविक प्रभाव सीमित रह जाता है।
दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में दिवाली के आसपास वायु गुणवत्ता अक्सर खराब हो जाती है। पटाखों से निकलने वाला धुआं और सूक्ष्म कण पहले से प्रदूषित हवा को और अधिक नुकसान पहुंचा सकते हैं।
ऐसे में अदालत ने जनभागीदारी और जागरूकता को प्रदूषण नियंत्रण के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखने का संकेत दिया।
दिवाली में पटाखों की परंपरा पर भी अदालत की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश ने दिवाली के साथ पटाखों के जुड़ने के ऐतिहासिक संदर्भ पर भी टिप्पणी की।
उन्होंने कहा कि मूल रूप से दिवाली में पटाखे जलाने की परंपरा नहीं थी। समय के साथ बारूद और आतिशबाजी के इस्तेमाल के बाद यह गतिविधि त्योहार का हिस्सा बन गई।
न्यायमूर्ति सुंदरेश ने कहा कि बारूद के इस्तेमाल का चलन लगभग 14वीं और 15वीं शताब्दी के दौरान बढ़ा और बाद में आतिशबाजी त्योहारों के उत्सव से जुड़ गई।
अदालत की इस टिप्पणी का उद्देश्य यह रेखांकित करना था कि दिवाली की मूल भावना रोशनी और उत्सव से जुड़ी है, न कि अनिवार्य रूप से पटाखे जलाने से।
इस दृष्टिकोण के आधार पर अदालत ने लोगों को पारंपरिक उत्सव की भावना बनाए रखते हुए पर्यावरण के अनुकूल तरीके अपनाने के लिए प्रेरित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
पटाखों में बेरियम की मात्रा पर भी विचार कर रहा है सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट केवल पटाखों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध तक सीमित नहीं है, बल्कि आतिशबाजी में इस्तेमाल होने वाले रासायनिक पदार्थों और उनकी सुरक्षा से जुड़े पहलुओं की भी जांच कर रहा है।
अदालत पटाखों में बेरियम की स्वीकार्य मात्रा से संबंधित मुद्दे पर भी विचार कर रही है। बेरियम कुछ प्रकार की आतिशबाजी में रंग और प्रभाव पैदा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
इस रसायन की मात्रा और उसके पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर अदालत के सामने सवाल उठाए गए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि बेरियम की स्वीकार्य मात्रा से जुड़े मुद्दे पर दिवाली के बाद सुनवाई की जाएगी।
इससे स्पष्ट है कि अदालत पटाखों के नियमन को केवल बिक्री और इस्तेमाल के प्रतिबंध के रूप में नहीं, बल्कि उनके निर्माण में इस्तेमाल होने वाले रसायनों और पर्यावरणीय प्रभावों के व्यापक संदर्भ में भी देख रही है।
याचिकाकर्ताओं ने पटाखों के निर्माण पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग की
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत के सामने पटाखों के निर्माण और बिक्री से जुड़े कई गंभीर मुद्दे उठाए।
उन्होंने कहा कि सरकार नियामकीय प्रक्रिया और संबंधित पक्षों से परामर्श पूरा करने के लिए दो सप्ताह का समय मांग रही है, जबकि इस दौरान बाजार में पटाखों की बिक्री और परिवहन जारी है।
याचिकाकर्ता ने पटाखों के निर्माण पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की। उनका तर्क था कि पटाखों से होने वाला प्रदूषण लोगों के जीवन के अधिकार के लिए खतरा पैदा करता है।
उन्होंने यह भी कहा कि पटाखा उद्योग में बाल श्रम और भंडारण से जुड़े नियमों के उल्लंघन जैसी समस्याएं मौजूद हैं।
याचिकाकर्ता के अनुसार, केवल प्रदूषण नियंत्रण के लिए सीमित प्रतिबंध पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि पटाखों के निर्माण और उनकी आपूर्ति व्यवस्था पर भी प्रभावी नियंत्रण आवश्यक है।
उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि जब तक प्रभावी नियामकीय व्यवस्था तैयार नहीं होती, तब तक पटाखों पर प्रतिबंध जारी रखा जाना चाहिए।
एमिकस क्यूरी ने बताया पटाखों के धुएं से स्वास्थ्य को खतरा
सुप्रीम कोर्ट की सहायता कर रहीं एमिकस क्यूरी अपराजिता सिंह ने पटाखों से निकलने वाले जहरीले धुएं और सूक्ष्म कणों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर चिंता जताई।
उन्होंने अदालत को बताया कि आतिशबाजी से कई प्रकार की हानिकारक गैसें और सूक्ष्म कण निकलते हैं। इनमें पीएम 2.5 जैसे प्रदूषक भी शामिल हैं, जो सांस के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर सकते हैं।
पीएम 2.5 बेहद छोटे आकार के प्रदूषणकारी कण होते हैं। इनके फेफड़ों तक पहुंचने और शरीर के विभिन्न अंगों को प्रभावित करने की आशंका रहती है।
अपराजिता सिंह ने डॉक्टरों के अनुभवों का हवाला देते हुए कहा कि वायु प्रदूषण के कारण फेफड़ों के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। इसका असर बच्चों और धूम्रपान नहीं करने वाले लोगों पर भी देखा जा रहा है।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि बाजार में कई पटाखों को ग्रीन क्रैकर्स बताकर बेचा जा रहा है, जबकि उनकी वास्तविक पहचान और प्रमाणिकता की जांच के लिए भरोसेमंद व्यवस्था पर्याप्त नहीं है।
उनके अनुसार, ग्रीन क्रैकर्स भी पूरी तरह प्रदूषणमुक्त नहीं होते। वे पारंपरिक पटाखों की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत कम प्रदूषण फैलाते हैं, लेकिन इससे उनका पर्यावरणीय प्रभाव समाप्त नहीं हो जाता।
एमिकस क्यूरी ने अदालत से आग्रह किया कि जब तक प्रभावी निगरानी और नियमन की व्यवस्था लागू नहीं होती, तब तक प्रतिबंध जारी रखा जाए।
पटाखा निर्माताओं ने पूर्ण प्रतिबंध का किया विरोध
दूसरी ओर, पटाखा निर्माताओं की ओर से पेश हुए अधिवक्ता जे. साई दीपक ने पूर्ण प्रतिबंध की मांग का विरोध किया।
उन्होंने अदालत में दलील दी कि पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से समस्या समाप्त नहीं होती, बल्कि इससे अवैध बाजार को बढ़ावा मिल सकता है।
उनका कहना था कि प्रतिबंध के कारण चीनी पटाखों की तस्करी और बिना लाइसेंस वाले उत्पादों की बिक्री बढ़ने की आशंका रहती है। ऐसे उत्पाद निर्धारित सुरक्षा और गुणवत्ता मानकों का पालन किए बिना बाजार में पहुंच सकते हैं।
साई दीपक ने कहा कि पटाखा उद्योग पहले से ही विस्फोटक अधिनियम के तहत नियमन के दायरे में आता है। इसलिए नियमों का उल्लंघन करने वाले निर्माताओं के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।
उन्होंने विशेष रूप से क्यूआर कोड संबंधी नियमों के उल्लंघन का मुद्दा उठाया और कहा कि जिन निर्माताओं द्वारा निर्धारित नियमों का पालन नहीं किया जाता, उनके लाइसेंस रद्द किए जा सकते हैं।
निर्माताओं की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि कुछ क्षेत्रों में प्रदूषण के स्तर में कमी आई है, लेकिन नियमों का पालन करने वाले निर्माताओं को भी उन लोगों की गलतियों के कारण नुकसान उठाना पड़ रहा है जो नियमों का उल्लंघन करते हैं।
उनका कहना था कि पूर्ण प्रतिबंध के बजाय मौजूदा नियामकीय व्यवस्था को प्रभावी तरीके से लागू करना अधिक उपयोगी होगा।
दिल्ली सरकार से सुप्रीम कोर्ट ने मांगा जवाब
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार की प्रदूषण नियंत्रण व्यवस्था और तैयारियों पर भी सवाल उठाए।
अदालत ने पूछा कि दिल्ली में मौजूद 39 वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्रों में से केवल नौ ही चालू क्यों थे। पीठ ने यह भी जानना चाहा कि पहले दिए गए निर्देशों के बाद सरकार ने क्या कदम उठाए हैं।
अदालत ने अधिकारियों से निरीक्षण व्यवस्था, प्रवर्तन टीमों की संख्या और अवैध रूप से पटाखे बेचने वालों के खिलाफ की गई कार्रवाई का विवरण मांगा।
इस दौरान दिल्ली सरकार और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने पक्ष रखा।
उन्होंने अदालत को बताया कि वायु प्रदूषण दिल्ली के सामने हर साल आने वाली गंभीर समस्या है और इससे निपटने के लिए कई उपाय लागू किए जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि सरकार इस बार पिछले वर्ष की तुलना में बेहतर तैयारी के साथ प्रदूषण नियंत्रण के प्रयास कर रही है।
1 नवंबर से दिल्ली में लागू होगी नई वाहन व्यवस्था
ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि दिल्ली सरकार ने 1 नवंबर से एक नई योजना शुरू करने की तैयारी की है।
इसके तहत राष्ट्रीय राजधानी के बाहर से दिल्ली में प्रवेश करने वाले वाहनों के लिए बीएस-6 उत्सर्जन मानकों का पालन करना आवश्यक होगा।
इस कदम का उद्देश्य राजधानी में बाहर से आने वाले वाहनों के कारण होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करना है।
सरकार ने यातायात का दबाव कम करने के लिए सरकारी कार्यालयों के समय में भी बदलाव किया है। इसके अलावा निर्माण स्थलों के आसपास एंटी-स्मॉग गन तैनात की गई हैं।
अदालत को बताया गया कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए विभिन्न योजनाएं, नियंत्रण केंद्र और एयर वार्डन भी तैनात किए गए हैं।
दिल्ली सरकार के अनुसार, राजधानी में कुल 608 एंटी-स्मॉग गन लगाई गई हैं। इनका इस्तेमाल निर्माण गतिविधियों और धूल से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने के प्रयासों के तहत किया जा रहा है।
ऐश्वर्या भाटी ने यह भी स्वीकार किया कि जिन दिनों पटाखों के इस्तेमाल की अनुमति रही है, उन दिनों वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) का स्तर अधिक दर्ज किया गया।
दिवाली से पहले प्रदूषण नियंत्रण बना बड़ी चुनौती
दिल्ली में दिवाली के आसपास वायु प्रदूषण को नियंत्रित करना प्रशासन के लिए हर साल एक बड़ी चुनौती बन जाता है। वाहनों से निकलने वाला धुआं, निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल, औद्योगिक उत्सर्जन और मौसमी परिस्थितियां पहले से ही वायु गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं।
ऐसे में पटाखों से निकलने वाला धुआं प्रदूषण की स्थिति को और गंभीर बना सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की इस सुनवाई से यह स्पष्ट है कि अदालत केवल प्रतिबंध लगाने के बजाय उनके प्रभावी क्रियान्वयन पर भी ध्यान दे रही है।
विराट कोहली जैसे लोकप्रिय खिलाड़ियों को जागरूकता अभियान से जोड़ने का सुझाव इसी व्यापक प्रयास का हिस्सा माना जा सकता है। लोकप्रिय हस्तियों की पहुंच समाज के बड़े वर्ग तक होती है और उनके संदेश का प्रभाव विशेष रूप से युवाओं पर पड़ सकता है।
हालांकि, प्रदूषण की समस्या का स्थायी समाधान केवल जनजागरूकता से संभव नहीं है। इसके लिए सरकारी निगरानी, नियमों का सख्त पालन, अवैध पटाखों की बिक्री पर रोक और नागरिकों की जिम्मेदारी भी जरूरी है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट पटाखों के नियमन, ग्रीन क्रैकर्स की प्रमाणिकता, बेरियम की मात्रा और दिल्ली सरकार की प्रदूषण नियंत्रण तैयारियों जैसे मुद्दों पर विचार कर रहा है। दिवाली के बाद होने वाली अगली सुनवाई में इन विषयों पर आगे की दिशा स्पष्ट होने की उम्मीद है।