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    UNSC में स्थायी सीट के लिए भारत की 30 साल पुरानी कोशिश को यूरोपीय समर्थन, लेकिन सुधार की राह अब भी अटकी

    1 hour ago

    Yugcharan News / 22-09-2026

    भारत की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता हासिल करने की करीब तीन दशक पुरानी कोशिश को 22 सितंबर 2026 को यूरोप के चार देशों के समूह से महत्वपूर्ण समर्थन मिला। न्यूयॉर्क में पहली V4+India विदेश मंत्रियों की बैठक के बाद स्लोवाकिया के विदेश मंत्री युराज ब्लानार ने कहा कि भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य के रूप में जगह मिलनी चाहिए। हालांकि, भारत की दावेदारी को लगातार मिल रहे अंतरराष्ट्रीय समर्थन के बावजूद संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद सुधार की प्रक्रिया अभी भी किसी औपचारिक बातचीत के दस्तावेज तक नहीं पहुंच पाई है।

    V4 समूह में पोलैंड, हंगरी, स्लोवाकिया और चेकिया शामिल हैं। स्लोवाक विदेश मंत्री ने भारत को ग्लोबल साउथ का प्रमुख देश और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उभरती शक्ति बताते हुए सुरक्षा परिषद में स्थायी भूमिका दिए जाने का समर्थन किया।

    यह समर्थन ऐसे समय आया है जब भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग को लगातार उठा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 12 सितंबर को नई दिल्ली में ब्रिक्स नेताओं की बैठक के दौरान कहा था कि सुरक्षा परिषद में सुधार को अब और टाला नहीं जा सकता। भारत का जोर इस बात पर है कि सुधार को लेकर होने वाली बातचीत के लिए स्पष्ट समयसीमा और ठोस परिणाम तय किए जाएं।

    भारत की दावेदारी के सामने केवल समर्थन ही नहीं, कई सवाल

    भारत की स्थायी सदस्यता का मुद्दा केवल इस बात तक सीमित नहीं है कि कितने देश भारत का समर्थन करते हैं। रक्षा और रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ राजीश कुमार के मुताबिक, सुरक्षा परिषद के संभावित विस्तार से जुड़े कई बुनियादी सवाल अभी अनसुलझे हैं।

    इनमें यह तय करना शामिल है कि नए स्थायी सदस्य कौन होंगे, कितनी नई सीटें बनाई जाएंगी, उन्हें अलग-अलग क्षेत्रों में किस तरह बांटा जाएगा और एक ही क्षेत्र के अलग-अलग देशों की दावेदारियों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा।

    भारत फिलहाल 2028-29 के लिए सुरक्षा परिषद की एक और दो वर्षीय गैर-स्थायी सीट के लिए भी अभियान चला रहा है। इस अभियान के लिए भारत ने ‘SHANTI’ थीम पेश की है। इस सीट के लिए चुनाव जून 2027 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में होना है।

    सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना क्या है?

    संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं। इनमें पांच स्थायी सदस्य हैं—अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन। इन्हें P5 कहा जाता है।

    इन पांचों देशों के पास वीटो अधिकार है। इसका अर्थ है कि परिषद में किसी प्रस्ताव को रोकने की क्षमता प्रत्येक स्थायी सदस्य के पास होती है।

    बाकी 10 सदस्य महासभा के चुनाव के जरिए चुने जाते हैं और उनका कार्यकाल दो वर्ष का होता है। इन गैर-स्थायी सदस्यों के पास वीटो अधिकार नहीं होता।

    संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 108 के तहत सुरक्षा परिषद की संरचना में बदलाव के लिए महासभा के दो-तिहाई सदस्यों की मंजूरी और दो-तिहाई सदस्य देशों द्वारा इसकी पुष्टि जरूरी है। इसमें पांचों स्थायी सदस्यों की मंजूरी भी अनिवार्य है।

    सुरक्षा परिषद का पिछला बड़ा विस्तार 1965 में हुआ था। उस समय निर्वाचित सदस्यों की संख्या छह से बढ़ाकर 10 की गई थी।

    सुधार प्रक्रिया 2009 से चल रही है

    भारत सुरक्षा परिषद में अधिक समान प्रतिनिधित्व की मांग लंबे समय से करता रहा है। 1992 में भारत उन गुटनिरपेक्ष देशों में शामिल था, जिन्होंने सुरक्षा परिषद में समान प्रतिनिधित्व से संबंधित महासभा के मसौदा प्रस्ताव की पहल की थी।

    सुरक्षा परिषद सुधार पर अंतर-सरकारी वार्ता यानी Intergovernmental Negotiations (IGN) की शुरुआत 2009 में हुई थी। हालांकि, इस प्रक्रिया में अभी तक ऐसा सहमत दस्तावेज तैयार नहीं हो सका है, जिसे सुरक्षा परिषद के ढांचे में बदलाव की औपचारिक प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए आधार बनाया जा सके।

    2015 में महासभा ने सदस्य देशों की अलग-अलग राय को एकत्र करने वाले ढांचे संबंधी दस्तावेज को रिकॉर्ड में लिया था। इसे इस प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना गया, लेकिन इसके बाद भी वास्तविक टेक्स्ट-आधारित बातचीत शुरू नहीं हो सकी।

    भारत और G4 के उसके साझेदार—ब्राजील, जर्मनी और जापान—लगातार टेक्स्ट-आधारित वार्ता शुरू करने की मांग करते रहे हैं।

    P5 देशों का भारत को लेकर रुख

    सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में से अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस सार्वजनिक रूप से भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का समर्थन कर चुके हैं।

    चीन का रुख अपेक्षाकृत अलग है। चीन ने विभिन्न मौकों पर संयुक्त राष्ट्र में भारत की बड़ी भूमिका की आकांक्षा को समर्थन देने की बात कही है। 12 सितंबर 2026 की ब्रिक्स नई दिल्ली घोषणा में भी संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधार का समर्थन किया गया था तथा ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने की बात कही गई थी।

    हालांकि, विशेषज्ञों के अनुसार किसी देश की स्थायी सदस्यता का समर्थन और किसी विशेष सुधार मॉडल का समर्थन दो अलग-अलग बातें हैं। भारत के पक्ष में पश्चिमी देशों का समर्थन होने के बावजूद वे जापान, जर्मनी और व्यापक सुरक्षा परिषद विस्तार के भी समर्थक हैं।

    सुरक्षा परिषद में वीटो का मुद्दा सबसे जटिल प्रश्नों में से एक बना हुआ है। पूर्व राजनयिक दिलीप सिन्हा के अनुसार, P5 देशों के बीच वीटो को लेकर अपने हित हैं और नए स्थायी सदस्यों को समान वीटो अधिकार देने पर सहमति बनाना आसान नहीं रहा है।

    ‘कॉफी क्लब’ भी सुधार के रास्ते में बड़ी चुनौती

    सुरक्षा परिषद सुधार की बातचीत में ‘Uniting for Consensus’ नामक समूह भी सक्रिय है, जिसे अनौपचारिक रूप से ‘कॉफी क्लब’ कहा जाता है। यह समूह नए स्थायी सदस्यों को शामिल करने के बजाय लंबे कार्यकाल वाली निर्वाचित सीटों के विस्तार का समर्थन करता है।

    इस समूह के भीतर कई क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विताएं भी दिखाई देती हैं। भारत के स्थायी सदस्य बनने के दावे का पाकिस्तान विरोध करता रहा है, जबकि जापान, जर्मनी और ब्राजील की दावेदारियों के सामने क्रमशः दक्षिण कोरिया, इटली-स्पेन और अर्जेंटीना जैसे क्षेत्रीय हित जुड़े हुए हैं।

    यही कारण है कि सुरक्षा परिषद सुधार की प्रक्रिया केवल भारत और चीन के बीच मतभेद का मामला नहीं है। विभिन्न क्षेत्रों में पड़ोसी और प्रतिस्पर्धी देशों की अपनी-अपनी दावेदारियां भी प्रक्रिया को जटिल बनाती हैं।

    पूर्व भारतीय स्थायी प्रतिनिधि टीएस तिरुमूर्ति के अनुसार, इस समूह की स्थिति यह है कि सुधार पर तब तक औपचारिक बातचीत आगे नहीं बढ़नी चाहिए, जब तक सुधार के व्यापक मॉडल पर सहमति न बन जाए। इससे पहले बातचीत के लिए कोई दस्तावेज तैयार करना भी मुश्किल हो जाता है।

    G4 का छह स्थायी सीटों का प्रस्ताव

    भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान का G4 समूह लंबे समय से सुरक्षा परिषद के विस्तार की मांग करता रहा है। G4 का मौजूदा प्रस्ताव 2005 के मसौदा प्रस्ताव से जुड़ा है।

    इस प्रस्ताव में छह नई स्थायी सीटें बनाने की बात कही गई थी। इनमें एशिया और अफ्रीका के लिए दो-दो तथा पश्चिमी यूरोप और लैटिन अमेरिका के लिए एक-एक सीट शामिल थी। इसके अलावा चार नई गैर-स्थायी सीटों का भी प्रस्ताव था।

    नए स्थायी सदस्यों को शुरुआत में वीटो का इस्तेमाल नहीं करने और 15 वर्ष बाद इसकी समीक्षा करने का प्रस्ताव रखा गया था।

    भारत ने अप्रैल 2026 में हुई अंतर-सरकारी वार्ता में इस प्रस्ताव के प्रति अपना समर्थन दोहराया। भारत का तर्क रहा है कि नए स्थायी सदस्यों को वीटो से पूरी तरह अलग रखना सुरक्षा परिषद में वास्तविक सुधार के उद्देश्य को सीमित कर सकता है।

    अफ्रीकी देशों की भूमिका निर्णायक

    अफ्रीकी देशों की स्थिति भी सुरक्षा परिषद सुधार की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण है। महासभा में अफ्रीकी समूह के 54 सदस्य हैं और किसी भी बड़े सुधार के लिए महासभा के दो-तिहाई समर्थन की आवश्यकता होने के कारण अफ्रीकी देशों की सामूहिक स्थिति का महत्व बढ़ जाता है।

    अफ्रीकी संघ का 2005 का ‘एजुलविनी कंसेंसस’ कम से कम दो नई स्थायी अफ्रीकी सीटों की मांग करता है। इसके साथ अफ्रीका के लिए पांच गैर-स्थायी सीटों की भी मांग की गई है।

    अफ्रीकी समूह के भीतर भी यह तय करने की चुनौती है कि स्थायी सीट मिलने की स्थिति में किन देशों को उसका प्रतिनिधित्व करना चाहिए। यही मुद्दा G4 की पुरानी पहल के लिए भी एक बड़ी बाधा रहा है।

    गैर-स्थायी सदस्य के रूप में भारत का रिकॉर्ड

    स्थायी सीट की मांग के समानांतर भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में गैर-स्थायी सदस्य के रूप में भी सक्रिय रहा है। भारत 2021-22 में सुरक्षा परिषद का सदस्य चुना गया था और उसे 193 सदस्यीय महासभा में 184 वोट मिले थे।

    भारत 1950-51 से अब तक आठ बार सुरक्षा परिषद का गैर-स्थायी सदस्य रह चुका है। उपलब्ध आकलनों के अनुसार, इन कार्यकालों के दौरान भारत ने सर्वसम्मति से अपनाए गए 90 प्रतिशत से अधिक प्रस्तावों के पक्ष में मतदान किया।

    संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में भारत का योगदान भी उसकी दावेदारी का एक महत्वपूर्ण आधार रहा है। मई 2026 तक भारत नेपाल के बाद संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में सैनिकों और पुलिसकर्मियों का दूसरा सबसे बड़ा योगदानकर्ता था। केवल सैन्य कर्मियों की संख्या के मामले में भारत सबसे बड़ा योगदानकर्ता बताया गया है।

    भारत पिछले छह दशकों में संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों के लिए 2.6 लाख से अधिक कर्मियों को भेज चुका है। इनमें 177 भारतीय शांति सैनिकों की ड्यूटी के दौरान मौत हुई है।

    आगे की राह क्या है?

    भारत को मिल रहा अंतरराष्ट्रीय समर्थन उसकी स्थायी सदस्यता की मांग को वैश्विक मंच पर बनाए रखने में मदद करता है, लेकिन केवल समर्थन जुटाना पर्याप्त नहीं है। मुख्य चुनौती संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सुधार की प्रक्रिया को महासभा की सामान्य बहस से आगे ले जाकर एक ऐसे सहमत बातचीत दस्तावेज तक पहुंचाना है, जिस पर वास्तविक वार्ता शुरू हो सके।

    भारत और उसके G4 साझेदार टेक्स्ट-आधारित बातचीत की मांग कर रहे हैं, जबकि सुधार के मॉडल, स्थायी सीटों की संख्या, वीटो अधिकार और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार भारत को अपनी स्थायी सदस्यता की मुहिम जारी रखते हुए विभिन्न क्षेत्रीय समूहों के साथ समर्थन और सहमति का दायरा बढ़ाना होगा। सुरक्षा परिषद सुधार की प्रक्रिया में राजनीतिक परिस्थितियों के बदलने की संभावना भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।

    फिलहाल स्थिति यह है कि भारत की दावेदारी को अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और कई अन्य देशों से समर्थन मिल चुका है तथा अब V4 देशों ने भी इसके पक्ष में अपना रुख व्यक्त किया है। इसके बावजूद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का रास्ता तब तक औपचारिक रूप से आगे नहीं बढ़ सकता, जब तक व्यापक सुधार मॉडल पर सदस्य देशों के बीच बातचीत और सहमति के लिए आवश्यक प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती।

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