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    एकात्म मानवदर्शन भारतीय ज्ञान परंपरा की समग्र दृष्टि प्रदान करता है प्रो. श्रीनिवास वरखेडी पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 110वीं जयंती पर दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय शैक्षिक शोध संगोष्ठी का शुभारंभ

    59 minutes ago

    जयपुर। पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 110वीं जयंती के अवसर पर केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर परिसर एवं पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति समारोह समिति, जयपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय शैक्षिक शोध संगोष्ठी ‘पंडित दीनदयाल उपाध्याय एकात्म मानवदर्शन एवं भारतीय ज्ञान परंपरा’ का सोमवार को केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर परिसर के नूतन सभागार में शुभारंभ हुआ। संगोष्ठी का आयोजन ऑफलाइन एवं ऑनलाइन दोनों माध्यमों से किया जा रहा है, जिसमें देश-विदेश के विद्वान, शिक्षक, शोधार्थी एवं शिक्षाविद् सहभागिता कर रहे हैं।

    उद्घाटन सत्र में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेडी मुख्य अतिथि तथा प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संगठन मंत्री जे. नंदकुमार मुख्य वक्ता रहे। सिडनी संस्कृत स्कूल, ऑस्ट्रेलिया की संस्थापक प्राचार्य एवं पीआरओ डॉ. मीनाक्षी श्रीनिवासन ऑनलाइन माध्यम से विशिष्ट अतिथि के रूप में जुड़ीं। इस अवसर पर पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति समारोह समिति, जयपुर के अध्यक्ष प्रो. मोहन लाल छीपा तथा केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर परिसर के प्रभारी निदेशक प्रो. श्रीधर मिश्र भी मंचासीन रहे।

    उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए प्रो. श्रीनिवास वरखेडी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल ज्ञान अर्जित करने की परंपरा नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति, समाज, प्रकृति और समस्त सृष्टि के बीच संतुलित एवं समन्वित संबंध स्थापित करने की दृष्टि प्रदान करती है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानवदर्शन इसी भारतीय चिंतन परंपरा को आधुनिक संदर्भों में समझने और समाज के समग्र विकास की दिशा में आगे बढ़ने का महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि शिक्षा और शोध के माध्यम से भारतीय चिंतन की प्रासंगिकता को वैश्विक स्तर पर सामने लाने की आवश्यकता है।

    मुख्य वक्ता जे. नंदकुमार ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन एवं एकात्म मानवदर्शन के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दीनदयाल उपाध्याय का चिंतन भारतीय जीवन-दृष्टि की गहरी समझ पर आधारित था। उन्होंने विकास को केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित न मानकर व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आत्मिक विकास से जोड़कर देखा। उनके विचारों में भारतीय संस्कृति, स्वदेशी, आत्मनिर्भरता, सामाजिक समरसता एवं अंत्योदय जैसे विषयों का महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में एकात्म मानवदर्शन पर अकादमिक एवं शोधपरक विमर्श की आवश्यकता और अधिक बढ़ गई है।

    ऑस्ट्रेलिया से ऑनलाइन जुड़ीं डॉ. मीनाक्षी श्रीनिवासन ने भारतीय ज्ञान परंपरा के वैश्विक संदर्भ पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि संस्कृत एवं भारतीय ज्ञान परंपरा का अध्ययन भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं है। विश्व के विभिन्न देशों में भारतीय ज्ञान, संस्कृत भाषा एवं भारतीय दर्शन के प्रति रुचि बढ़ रही है। ऐसे अंतर्राष्ट्रीय शैक्षिक आयोजनों के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध पक्षों पर वैश्विक स्तर पर संवाद को गति मिलती है।

    समिति के अध्यक्ष प्रो. मोहन लाल छीपा ने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय का चिंतन भारतीय समाज की वास्तविक आवश्यकताओं एवं सांस्कृतिक आधार से जुड़ा हुआ है। उनकी 110वीं जयंती के अवसर पर आयोजित यह संगोष्ठी उनके विचारों को अकादमिक एवं शोध के व्यापक क्षेत्र से जोड़ने का महत्वपूर्ण प्रयास है। उन्होंने कहा कि देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों से विद्वानों और शोधार्थियों की सहभागिता भारतीय ज्ञान परंपरा तथा एकात्म मानवदर्शन पर गंभीर विमर्श को आगे बढ़ाएगी।

    प्रो. श्रीधर मिश्र ने अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए संगोष्ठी के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत एवं भारतीय दर्शन के अध्ययन-अध्यापन तथा शोध को निरंतर प्रोत्साहित कर रहा है। इस प्रकार की संगोष्ठियां शोधार्थियों एवं शिक्षकों को अपने शोध और विचार साझा करने के लिए सार्थक मंच प्रदान करती हैं।

    संगोष्ठी संयोजक डॉ. डमरूधरपति ने बताया कि दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय शैक्षिक शोध संगोष्ठी के लिए लगभग 300 प्रतिभागियों ने पंजीयन कराया है। देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों एवं शोध संस्थानों से विद्वान एवं शोधार्थी प्रत्यक्ष तथा ऑनलाइन माध्यम से शोधपत्र प्रस्तुत कर रहे हैं। संगोष्ठी में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानवदर्शन, भारतीय ज्ञान परंपरा, शिक्षा, संस्कृति, समाज, अर्थव्यवस्था, राष्ट्रचिंतन, सामाजिक समरसता एवं समकालीन संदर्भों से जुड़े विभिन्न विषयों पर अकादमिक विमर्श किया जा रहा है।

    इस अवसर पर ‘पंडित दीनदयाल उपाध्याय : एकात्म मानवदर्शन एवं भारतीय ज्ञान परंपरा’ तथा ‘दीनदयाल उपाध्याय विचारितम् एकात्म मानवदर्शनम्’ पुस्तकों का विमोचन भी किया गया।

    संगोष्ठी के प्रथम दिन 21 सितंबर को सात तकनीकी सत्र आयोजित किए गए, जिनमें विभिन्न शोधपत्रों की प्रस्तुतियों के साथ विषय विशेषज्ञों द्वारा अकादमिक चर्चा की गई। 22 सितंबर को भी सात तकनीकी सत्र आयोजित होंगे। इसके पश्चात समापन समारोह में दो दिवसीय शैक्षिक एवं शोध विमर्श के प्रमुख निष्कर्षों तथा विभिन्न विषयों पर हुए विचार-विनिमय को संक्षेप में प्रस्तुत किया जाएगा।

    आयोजकों के अनुसार संगोष्ठी का प्रमुख उद्देश्य पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानवदर्शन को भारतीय ज्ञान परंपरा के व्यापक संदर्भ में समझना तथा वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में उसकी शैक्षिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रासंगिकता पर शोधपरक विमर्श को बढ़ावा देना है। देश-विदेश के विद्वानों की सहभागिता के माध्यम से भारतीय चिंतन की विविध धाराओं पर संवाद के लिए व्यापक अकादमिक मंच उपलब्ध कराया जा रहा है।

    इस अवसर पर जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. मदन मोहन झा, पूर्व निदेशक प्रो. वाई. एस. रमेश, सह निदेशक प्रो. विष्णुकांत पाण्डेय, प्रो. शीशराम, डॉ. रानी दाधीच, डॉ. सीमा अग्रवाल, डॉ. सच्चिदानंद स्नेही सहित विश्वविद्यालय के अधिकारी, कर्मचारी, शिक्षक एवं शोधार्थी उपस्थित रहे।

     

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