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    जेईसीआरसी में ‘इको क्रेडिट्स’ की शुरुआत, पर्यावरण संरक्षण को मिलेगा अकादमिक सम्मान

    1 hour ago

    -कैंपस में 'सर्कुलर इकॉनमी' और विज़न 2030 का आगाज़

     

    -जेईसीआरसी ने पेश किया सस्टेनेबल भविष्य का रोडमैप

     

    जयपुर,

     

    हरित भारत के सपने को साकार करने के संकल्प के साथ, जेईसीआरसी यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (एसडीजी) ने सस्टेनेबिलिटी इम्पैक्ट एंड इनोवेशन समिट का आयोजन किया। "द इम्पैक्ट रिवोल्यूशन: यूथ, इंस्टीट्यूशंस एंड इंडस्ट्री" की थीम पर आधारित इस मंच ने प्रशासन, कॉर्पोरेट और पर्यावरण प्रेमियों के विचारों का एक अनूठा संगम पेश किया जिसका उद्देश्य नई पीढ़ी को जागरूक करने व उन्हें प्रकृति और प्रगति के बीच संतुलन बनाने वाले भविष्य का नेतृत्व सौंपना है।

     

    समिट में राजस्थान के एडिशनल चीफ़ सेक्रेटरी, आईएएस अजिताभ शर्मा ने युवाओं से कहा कि वे बिना सोचे-समझे 'डिफ़ॉल्ट जीवन' जीने के बजाय, समाज के जटिल पारिस्थितिक संकटों को सुलझाने के संकल्प के साथ अपने करियर का चुनाव करें। उनका मानना है कि सस्टेनेबिलिटी को केवल कागजी नीतियों तक सीमित न रहकर हमारे दैनिक कामकाज का अभिन्न अंग बनना चाहिए।

     

    इस दिशा में, उन्होंने जल व ऊर्जा प्रबंधन को एक 'बहु-विषयक' चुनौती बताया, जिसके समाधान के लिए कृषि, उद्योग और शहरी नीतियों में गहरे तालमेल की आवश्यकता है। उन्होंने भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा के लिए 'स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर' को सुदृढ़ करने पर ज़ोर दिया व स्पष्ट किया कि युवाओं को इन अहम विषयों से जुड़ने के लिए सार्थक अवसर मिलने चाहिए, जिससे वे सरकारी नीतियों पर सवाल उठा सकें, नए दृष्टिकोण ला सकें और भविष्य के सुशासन में एक मजबूत व जागरूक भागीदार बन सकें।

     

    इसी नीतिगत विज़न को जमीनी हकीकत में बदलते हुए, 'ग्रीन मैन ऑफ इंडिया' के नाम से विख्यात विरल देसाई ने उधना रेलवे स्टेशन के 'शहीद स्मृति वन' का उदाहरण देकर प्रकृति संरक्षण को एक जन-आंदोलन बनाने पर ज़ोर दिया। पर्यावरण रक्षा को आधुनिक 'सत्याग्रह' का नाम देते हुए, उन्होंने यूथ से 'पर्यावरण सेनानी' बनने का आह्वान किया; ताकि रिफ़ोरेस्टेशन महज एक विकल्प न रहकर, हम सभी की एक आनंददायक और जीवन-रक्षक ज़िम्मेदारी बन सके।

     

    नीति और जन-भागीदारी को आर्थिक नज़रिए से जोड़ते हुए, ईवाई के डायरेक्टर गोकुल पांडियन ने व्यवसायों से केवल नियमों के 'अनुपालन' तक सीमित रहने के बजाय पर्यावरणीय रणनीतियों को अपने मुख्य व्यापार मॉडल में शामिल करने का आग्रह किया। 'पीपल, प्लैनेट, प्रोफ़िट' सिद्धांत और 'कार्बन प्राइसिंग' का उल्लेख करते हुए 'ग्रीनवाशिंग' के दिखावे से बचने की सलाह दी। साथ ही, उन्होंने पारदर्शी व डेटा-आधारित ईएसजी रिपोर्टिंग पर बल दिया, ताकि कॉर्पोरेट कैपिटल का उपयोग सच्चे अर्थों में एक हरित और सुरक्षित भविष्य के निर्माण में हो सके।

     

    सस्टेनेबिलिटी को ग्राउंड रियलिटी में बदलते हुए, यूनिवर्सिटी ने 'इको क्रेडिट्स' की शुरुआत की है। जिसके ज़रिए ग्रीन प्रोजेक्ट्स में एक्टिव पार्टिसिपेशन देने वाले स्टूडेंट्स की मार्कशीट में सीधे 3 क्रेडिट्स जुड़ेंगे। साथ ही, युवाओं के इनोवेटिव आइडियाज़ को सपोर्ट करने के लिए ₹30,000 की 'सस्टेनेबिलिटी स्कॉलरशिप' का भी ऐलान किया गया है। हरित उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए जेईसीआरसी इन्क्यूबेशन सेंटर (जेआईसी) के माध्यम से ₹25 लाख का फंड तैयार किया है, जहाँ पर्यावरण अनुकूल स्टार्टअप्स को बिना किसी इक्विटी के पूरी फंडिंग और मेंटरशिप मिलेगी। साथ ही, सस्टेनेबल इनोवेशन से जुड़े पेटेंट के पंजीकरण से लेकर उन्हें बाजार तक पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया में यूनिवर्सिटी सहयोग करेगी।

     

    जेईसीआरसी के पर्यावरण संकल्प को एक नई ऊर्जा देते हुए, धीमंत अग्रवाल (डायरेक्टर, डिजिटल स्ट्रेटेजीज़) ने 'विज़न 2030' पेश किया; जिसके तहत पूरे कैंपस को 100 प्रतिशत प्लास्टिक-फ्री बनाने के साथ-साथ 'सर्कुलर इकॉनमी' के मॉडल को भी मज़बूती से लागू किया जाएगा। उन्होंने बताया कि हमारा मकसद आने वाली पीढ़ी के हाथों में एक 'संकट' सौंपना नहीं है, बल्कि सस्टेनेबिलिटी को उनके अच्छे भविष्य और सफल लीडरशिप की एक मज़बूत 'नींव' बनाना है। युवाओं को इस बदलाव से सीधे जोड़ने के लिए ही, अब तक 1800 से ज़्यादा छात्रों को माइक्रोसॉफ्ट, सेल्सफोर्स और ओप्पो जैसी बड़ी ग्लोबल कंपनियों में सस्टेनेबिलिटी इंटर्नशिप के अवसर प्रदान किए गए हैं।

     

    इसके साथ ही, सेंटर फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स की हेड, प्राची कौशिक ने संदेश दिया कि हमारी सही सोच, पक्के इरादे और एकजुटता ही पर्यावरण के इस संकट को एक ऐतिहासिक बदलाव का रूप दे सकती है।

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