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    नए वर्गीकरण से अरावली पर्वतमाला का 31.8% हिस्सा पारिस्थितिक खतरे में: संरक्षण समूह

    2 hours ago

    जयपुर। केंद्र सरकार द्वारा पहाड़ियों की कानूनी परिभाषा में हालिया बदलाव के बाद अरावली पर्वतमाला का एक बड़ा हिस्सा पारिस्थितिक जोखिम में आ गया है। एक जन-आधारित संरक्षण समूह ने उपग्रह आधारित अध्ययन का हवाला देते हुए दावा किया है कि अरावली क्षेत्र का लगभग 31.8 प्रतिशत हिस्सा पर्यावरणीय खतरे की श्रेणी में आ चुका है। यह जानकारी सोमवार को जयपुर में सामने रखी गई।

    संरक्षण समूह ‘वी आर अरावली’ (We Are Aravalli) के अनुसार, केंद्र सरकार द्वारा पहाड़ियों की ऊंचाई 100 मीटर तय किए जाने के बाद बड़ी संख्या में ऐसे क्षेत्र कानूनी संरक्षण से बाहर हो गए हैं, जो भूवैज्ञानिक और पारिस्थितिक रूप से अरावली श्रृंखला का अभिन्न हिस्सा हैं। समूह का कहना है कि इस वर्गीकरण ने न केवल पर्यावरणीय सुरक्षा को कमजोर किया है, बल्कि खनन और अन्य मानवीय गतिविधियों के लिए रास्ता भी खोल दिया है।

    समूह ने अरावली पर्वतमाला में खनन गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की है। उनका तर्क है कि अरावली न केवल उत्तर भारत के लिए एक प्राकृतिक ढाल की तरह काम करती है, बल्कि यह भूजल संरक्षण, जैव विविधता और जलवायु संतुलन में भी अहम भूमिका निभाती है। ऐसे में इसके किसी भी हिस्से को कानूनी सुरक्षा से बाहर करना दूरगामी नुकसान पहुंचा सकता है।

    संरक्षण समूह ने केंद्र सरकार के उस आकलन पर भी सवाल उठाए हैं, जिसमें प्रभावित क्षेत्र को केवल 0.19 प्रतिशत बताया गया है। ‘वी आर अरावली’ का कहना है कि यह आंकड़ा अरावली पर्वतमाला की वास्तविक भूवैज्ञानिक संरचना को सही ढंग से नहीं दर्शाता। समूह के अनुसार, उपग्रह चित्रों और वैज्ञानिक मानकों पर आधारित विश्लेषण स्पष्ट रूप से बताता है कि जोखिम का दायरा सरकारी आकलन से कहीं अधिक व्यापक है।

    इस बीच, अरावली पहाड़ियों की परिभाषा से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल अपने पूर्व निर्देशों को स्थगित कर दिया है। अदालत के इस कदम को लेकर भी पर्यावरण कार्यकर्ताओं की नजर बनी हुई है। उनका मानना है कि जब तक स्पष्ट और व्यापक परिभाषा तय नहीं होती, तब तक अरावली क्षेत्र में अवैध खनन और भूमि उपयोग में बदलाव जैसी गतिविधियों को रोकना मुश्किल रहेगा।

    पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली पर्वतमाला विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है और इसका पारिस्थितिक महत्व बेहद संवेदनशील है। राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर तक फैली यह श्रृंखला रेगिस्तान के विस्तार को रोकने में भी सहायक मानी जाती है। इसके कमजोर होने से न केवल स्थानीय पारिस्थितिकी, बल्कि क्षेत्रीय जलवायु पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

    संरक्षण समूह ने मांग की है कि अरावली पर्वतमाला को पूरी तरह “संरक्षित क्षेत्र” घोषित किया जाए और पहाड़ियों व पर्वतों के बीच ऊंचाई के आधार पर किए गए किसी भी तरह के भेद को समाप्त किया जाए। समूह का कहना है कि प्रकृति को मानव-निर्धारित मापदंडों में बांधना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं है।

     

    फिलहाल, यह मुद्दा नीति निर्धारकों, न्यायपालिका और पर्यावरण संगठनों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। आने वाले दिनों में इस पर क्या रुख अपनाया जाता है, यह अरावली पर्वतमाला के भविष्य और उत्तर भारत की पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।

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