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    सोने-चांदी की कीमतों में तेज गिरावट, वैश्विक शेयर बाजारों में हलचल

    2 hours ago

    वैश्विक कमोडिटी बाजारों में सोमवार को उस समय तेज उथल-पुथल देखने को मिली, जब सोने और चांदी की कीमतों में अचानक भारी गिरावट दर्ज की गई। सुरक्षित निवेश माने जाने वाले इन कीमती धातुओं में आई इस तेज गिरावट का असर दुनिया भर के शेयर बाजारों पर भी पड़ा और कई प्रमुख सूचकांकों में कमजोरी देखी गई।

    अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत करीब 8 प्रतिशत गिरकर 4,465 डॉलर प्रति औंस तक आ गई। गौरतलब है कि महज एक सप्ताह पहले ही सोना रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचते हुए लगभग 5,600 डॉलर प्रति औंस के स्तर को छू गया था। वहीं, चांदी की कीमतों में भी तेज गिरावट दर्ज की गई और यह करीब 7 प्रतिशत फिसल गई। इससे पहले शुक्रवार को चांदी में लगभग 30 प्रतिशत की बड़ी गिरावट देखी जा चुकी थी।

    विशेषज्ञों के अनुसार, हाल के हफ्तों में भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिकी केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता को लेकर बढ़ती चिंताओं के कारण निवेशक बड़ी संख्या में सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख कर रहे थे। इसी वजह से सोने और चांदी की कीमतें लगातार नए रिकॉर्ड बना रही थीं। हालांकि, बीते कुछ दिनों में परिस्थितियों में आए बदलाव ने निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया और बड़े पैमाने पर मुनाफावसूली देखने को मिली।

    बाजार विश्लेषकों का मानना है कि इस बिकवाली की एक बड़ी वजह अमेरिका में फेडरल रिजर्व के नए अध्यक्ष को लेकर हुई घोषणा है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा केविन वार्श को फेडरल रिजर्व के अगले अध्यक्ष के रूप में नामित किए जाने की खबर के बाद बाजारों में प्रतिक्रिया देखने को मिली। केविन वार्श को एक अनुभवी और स्थापित केंद्रीय बैंकिंग विशेषज्ञ माना जाता है। निवेशकों में यह धारणा बनी कि केंद्रीय बैंक की नीतियों में अत्यधिक राजनीतिक हस्तक्षेप की आशंका फिलहाल कम हो सकती है, जिससे सुरक्षित निवेश परिसंपत्तियों की मांग घट गई।

    ब्रोकरेज फर्मों से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि यह गिरावट इस संकेत के रूप में देखी जा रही है कि निवेशकों को अब फेडरल रिजर्व की स्वतंत्रता को लेकर कुछ हद तक भरोसा मिला है। इसी भरोसे के चलते सोना और चांदी जैसी सुरक्षित संपत्तियों से पैसा निकलकर अन्य जोखिम वाले निवेश विकल्पों की ओर जा रहा है।

    कीमती धातुओं के साथ-साथ औद्योगिक धातुओं की कीमतों में भी गिरावट दर्ज की गई। प्लैटिनम और तांबे की कीमतों में क्रमशः करीब 10 प्रतिशत और 9 प्रतिशत की गिरावट देखी गई। इन धातुओं की कीमतें भी हालिया तेजी के दौरान काफी ऊपर पहुंच गई थीं।

    इस बिकवाली का असर वैश्विक शेयर बाजारों पर भी साफ दिखाई दिया। अमेरिका में प्रमुख शेयर सूचकांकों से जुड़े वायदा कारोबार में कमजोरी के संकेत मिले। एसएंडपी 500 और नैस्डैक से जुड़े फ्यूचर्स में करीब 1 प्रतिशत तक की गिरावट का अनुमान जताया गया। यूरोप में भी शुरुआती कारोबार के दौरान प्रमुख सूचकांक दबाव में नजर आए।

    ब्रिटेन के प्रमुख शेयर सूचकांक एफटीएसई 100 में शुरुआती कारोबार में लगभग 0.4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। खासतौर पर कीमती धातुओं से जुड़ी खनन कंपनियों के शेयरों में तेज बिकवाली देखी गई। यूरोप का व्यापक स्टॉक्स 600 सूचकांक भी कमजोरी के साथ कारोबार करता नजर आया।

    कमोडिटी बाजार के अलावा क्रिप्टोकरेंसी बाजार में भी दबाव देखा गया। बिटकॉइन की कीमत सप्ताहांत में करीब 9 प्रतिशत गिर गई और यह 76,000 डॉलर के नीचे आ गई। मौजूदा स्तर पर बिटकॉइन अपनी पिछले वर्ष की ऊंचाई से करीब 40 प्रतिशत नीचे कारोबार कर रहा है।

    ऊर्जा बाजार में भी नरमी देखने को मिली। कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड का भाव घटकर करीब 64.80 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच तनाव में संभावित कमी के संकेतों से तेल की कीमतों पर दबाव बना है।

    हालांकि, डॉलर में सीमित मजबूती देखी गई। अमेरिकी डॉलर सूचकांक, जो छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की स्थिति को दर्शाता है, में हल्की बढ़त दर्ज की गई।

    इन सभी उतार-चढ़ावों के बावजूद कुछ विश्लेषकों का मानना है कि सोने की दीर्घकालिक संभावनाएं अब भी मजबूत बनी हुई हैं। कई वित्तीय संस्थानों का अनुमान है कि मौजूदा गिरावट के बाद भी साल के अंत तक सोने की कीमतें फिर से ऊंचे स्तरों की ओर बढ़ सकती हैं। उनका कहना है कि हालिया गिरावट भीड़भाड़ वाले निवेश से बाहर निकलने की प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती है।

    जानकारों के अनुसार, बीते एक साल में तेज बढ़त के बावजूद सोना अब भी पिछले वर्ष की तुलना में करीब 65 प्रतिशत ऊपर है, जबकि चांदी में सालाना आधार पर 120 प्रतिशत से अधिक की तेजी दर्ज की जा चुकी है। ऐसे में मौजूदा गिरावट को बाजार में संतुलन बनाने की एक प्रक्रिया के रूप में देखा जा रहा है।

    फिलहाल निवेशकों की नजर वैश्विक आर्थिक संकेतकों, केंद्रीय बैंकों के फैसलों और भू-राजनीतिक घटनाक्रमों पर बनी हुई है, जो आने वाले दिनों में कमोडिटी और शेयर बाजारों की दिशा तय कर सकते हैं।

     
     
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