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    प्रतिशोध की ज्वाला: जब भूणा को मिला अतीत का बोध

    3 days ago

    मेहन्दू से भेंट के बाद भूणा के जीवन की दिशा बदल गई। जैसे ही उन्हें सत्य का पता चला कि वे वास्तव में बगड़ावतों के वंशज हैं, उनके भीतर अपने पूर्वजों के अपमान का बदला लेने की अग्नि प्रज्वलित हो उठी। उन्होंने सीधे राण जाकर पातु से सत्यता की पुष्टि की। सत्य सामने आते ही भूणा ने तय किया कि वे न केवल अपना खोया हुआ सम्मान वापस लाएंगे, बल्कि उन प्रतीकों को भी मुक्त कराएंगे जो उनके परिवार की आन थे।

    भीलों की खाल पर विजय और बोर घोड़ी की मुक्ति

    भूणा ने एक रणनीतिक चाल चलते हुए राव से भीलों की खाल पर आक्रमण करने की अनुमति मांगी। उनका लक्ष्य था— बोर घोड़ी को मुक्त कराना, जो कभी उनके परिवार की शान थी और अब धांधू भील के कब्जे में अपमानित हो रही थी।

     * राव का षड्यंत्र: राव ने सोचा कि ८० हजार भीलों की सेना के सामने भूणा कभी जीवित नहीं बचेगा। इसी कुटिल मंशा से उन्होंने भूणा को युद्ध की अनुमति दे दी।

     * भीषण संग्राम: भीलमाल के मैदान में ५ महीने तक भयंकर युद्ध चला। जब संकट बढ़ा तो साथ आए सेनापति दीया और कालूमीर मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए।

     * अकेला योद्धा: अपनों के विश्वासघात के बावजूद भूणा विचलित नहीं हुए। उन्होंने धांधू भील का वध किया और अपनी पैतृक 'बोर घोड़ी' को बंधन मुक्त कराकर विजय का परचम लहराया।

    राण पर संकट: तलावत खां खिलजी का आक्रमण

    भगवान श्री देवनारायण जी का मंदिर देव धाम भोपा की ढाणी बेगस के महा फड़ वाचन भोपाजी बिरदी चंद कुमावत ने बताया कि जिस समय भूणा भीलों से लोहा ले रहे थे, उसी समय राण पर खरनार के बादशाह तलावत खां खिलजी का संकट मंडराने लगा। यह विवाद एक पुराने वचन को लेकर था। तलावत खां ने राव की पुत्री तारादे से निकाह की मांग की और इनकार करने पर राण को घेर लिया।

    बिसलदेव और राव की कायरता तब सामने आई जब उन्होंने तारादे को राताकोट में छिपा दिया। अंततः, विश्वासघात और रणनीति के जाल में फंसकर राव को तलावत खां ने लोहे के पिंजरे में कैद कर लिया और अपने साथ सात समुद्र पार खरनार ले गया।

    सात समुद्र पार काबुल की चढ़ाई

    भोपाजी बिरदी चंद कुमावत ने बताया कि

    जब तारादे का संदेश भूणा तक पहुंचा, तो उनके सामने धर्मसंकट था। एक तरफ वे लोग थे जिन्होंने उनके परिवार का विनाश किया, और दूसरी तरफ बहन तारादे की करुण पुकार। रानी सांखली के उलाहने ने भूणा के क्षत्रिय धर्म को जगा दिया। उन्होंने एक विशाल सेना तैयार की और काबुल की ओर कूच किया।

    दैवीय सहायता और भैरु का मार्ग

    विशाल समुद्र को पार करना असंभव लग रहा था। बोर घोड़ी ने भी पानी लांघने में असमर्थता जताई। तब बन्ना चारण के परामर्श पर भूणा ने देवनारायण का स्मरण किया।

    > चमत्कार: देवनारायण की कृपा से भैरु प्रकट हुए और अथाह जलराशि के बीच पत्थरों का एक सुगम मार्ग बना दिया। इस अलौकिक पुल के सहारे भूणा की सेना सात समुद्र पार खरनार जा पहुंची।

    क्षमा और विजय: जब रक्त के रिश्तों ने बदला इतिहास

    खरनार में भूणा ने प्रचंड प्रहार किया और बादशाह तलावत खां को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। जब भूणा बादशाह का वध करने ही वाले थे, तब बीच में शोभादे आ गई। शोभादे ने अपने सुहाग की रक्षा की भीख मांगी। भूणा ने अपनी बहन समान शोभादे के सुहाग को जीवनदान दिया और राव को पिंजरे से मुक्त कराया।

    उपसंहार: राण में खुशियों की वापसी

    जब भूणा विजयी होकर राव को साथ लेकर राण लौटे, तो पूरे राज्य में उत्सव का माहौल छा गया। राताकोट में घी के दीपक जलाए गए। यह जीत केवल एक राजा की मुक्ति नहीं थी, बल्कि एक वीर पुत्र द्वारा अपने कुल के गौरव को पुनः स्थापित करने की गाथा थी।

     

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