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    सावर विजय अभियान: जब देवनारायण के पराक्रम के आगे नतमस्तक हुआ पार्वती का मायावी शेर

    1 hour ago

    सावर विजय अभियान: जब देवनारायण के पराक्रम के आगे नतमस्तक हुआ पार्वती का मायावी शेर

    विशेष कवर स्टोरी: लोकगाथा का एक गौरवशाली अध्याय

    देवनारायण भक्ति परंपरा के इतिहास में सावर की बुंली घोड़ी को वापस लाने का प्रसंग शौर्य और अडिग विश्वास की अनूठी मिसाल है। यह कहानी केवल एक युद्ध की नहीं, बल्कि साहस और दिव्य परीक्षा की है।

    ​पुश्तैनी धरोहर की खोज और भाट का परामर्श

    ​कथा की शुरुआत तब होती है जब देवनारायण और मेहन्दू, छोछू भाट से अपने पूर्वजों के सामान और संपत्ति के बारे में जानकारी मांगते हैं। भाट खुलासा करता है कि सवाई भोज की प्रसिद्ध 'बुंली घोड़ी' इस समय सावर के ठाकुर दिया के कब्जे में है। अपनी कुल की धरोहर को पुनः प्राप्त करने का संकल्प लेकर मेहन्दू सबसे पहले आगे बढ़ते हैं। छोछू भाट को साथ लेकर वे मानकराय बछेरा पर सवार होकर सावर की ओर कूच कर देते हैं।

    ​मेहन्दू का पीछे हटना और भय का वातावरण

    ​यात्रा के दौरान जब दो रास्तों का चयन करना था, तब मेहन्दू ने सुरक्षा के बजाय 'खतरे वाले' छोटे रास्ते को चुना। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। घने जंगलों में पार्वती ने देवनारायण के परिवार की परीक्षा लेने के लिए अपनी माया से नौ हाथ लंबा एक विशालकाय शेर उत्पन्न किया। उस भयानक जीव को देखकर मेहन्दू का साहस डगमगा गया और वे बिना लक्ष्य पूरा किए खेड़ा चौसला वापस लौट आए।

    ​देवनारायण का प्रस्थान और पार्वती का हठ

    ​जब मेहन्दू खाली हाथ लौटे, तब देवनारायण ने स्वयं कमान संभाली। वे अपने नीलागर घोड़े पर सवार होकर छोछू भाट के साथ उसी खतरनाक रास्ते पर निकल पड़े। उसी वन में महादेव ध्यानमग्न थे और पार्वती उनके चरण दबा रही थीं। देवनारायण को आता देख पार्वती ने उनकी परीक्षा लेने की ठानी। महादेव ने उन्हें चेताया कि— "यह स्वयं नारायण का अवतार है, तुम्हारा शेर मारा जाएगा," किंतु पार्वती ने अपने हठवश मायावी शेर को देवनारायण के मार्ग में खड़ा कर दिया।

    ​शेर और देवनारायण का संवाद: धर्म और मर्यादा की लड़ाई

    ​शेर को सामने देख छोछू भाट डर के मारे पलाश के पेड़ पर जा चढ़ा। लेकिन देवनारायण विचलित नहीं हुए। उन्होंने शेर से मार्ग देने का आग्रह किया। जब शेर ने युद्ध की चुनौती दी, तो देवनारायण ने एक मर्यादा पुरुषोत्तम की भांति व्यवहार किया। उन्होंने कहा कि वे एक निहत्थे जीव पर शस्त्र नहीं उठाएंगे। शेर के कहने पर उन्होंने अपने चमड़े के जूते उतारे और फिर अपने 'खांडे' के एक ही प्रहार से उस विशालकाय शेर का सिर धड़ से अलग कर दिया।

    ​छोछू भाट का हास्य प्रसंग और विजय की ओर कदम

    ​शेर के धराशायी होने के बाद जब खतरा टल गया, तब छोछू भाट पेड़ से नीचे उतरा। अपनी घबराहट को वीरता में बदलने की कोशिश करते हुए भाट ने मरे हुए शेर की नाभि में कटार घोंपी और दावा किया कि शेर अब मरा है। भाट की इस चपलता और मासूमियत को देखकर देवनारायण मुस्कुरा दिए। यह प्रसंग सिद्ध करता है कि जिसके साथ सत्य और साहस हो, उसके मार्ग में स्वयं नियति भी बाधा नहीं डाल सकती।

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