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    भारत में निर्वासन से शेख हसीना ने बांग्लादेश के आगामी चुनाव को बताया “बहिष्करण पर आधारित”, अस्थिरता की चेतावनी

    3 days ago

    भारत में निर्वासन के दौरान बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना ने अगले महीने होने वाले आम चुनावों पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि यदि चुनाव समावेशी, स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं हुए तो देश को लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता का सामना करना पड़ेगा। हसीना ने आरोप लगाया कि अंतरिम सरकार ने उनकी पार्टी आवामी लीग को चुनाव से बाहर रखकर उनके समर्थकों के लाखों मतों को जानबूझकर वंचित किया है।

    एसोसिएटेड प्रेस (AP) को भेजे ईमेल में शेख हसीना ने लिखा कि किसी बड़े तबके को राजनीतिक भागीदारी से वंचित करना संस्थानों की वैधता को कमजोर करता है और भविष्य की अस्थिरता के लिए जमीन तैयार करता है। उनके शब्दों में, “बहिष्करण से जन्मी सरकार बंटे हुए राष्ट्र को एकजुट नहीं कर सकती।”

    चुनावी प्रक्रिया पर सवाल

    बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव को दशकों का सबसे अहम चुनाव माना जा रहा है। करीब 12.7 करोड़ मतदाता मतदान के पात्र हैं। यह चुनाव शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद पहला होगा। अगस्त 2024 में छात्र आंदोलन के बाद भड़की हिंसा और राजनीतिक उथल-पुथल के बीच हसीना देश छोड़कर भारत चली गई थीं।

    वर्तमान में नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम प्रशासन चुनावी प्रक्रिया की निगरानी कर रहा है। यूनुस ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने का आश्वासन दिया है, लेकिन विपक्षी दलों और मानवाधिकार संगठनों ने प्रक्रिया की समावेशिता पर सवाल उठाए हैं—खासकर आवामी लीग पर लगे प्रतिबंध के बाद।

    संवैधानिक सुधार और सुरक्षा चिंताएँ

    चुनाव के साथ-साथ मतदाताओं के सामने एक संवैधानिक जनमत-संग्रह भी है, जिसमें व्यापक राजनीतिक सुधारों का प्रस्ताव रखा गया है। राजधानी ढाका समेत कई शहरों में चुनाव प्रचार शुरू हो चुका है। हालांकि, सुरक्षा व्यवस्था और जनमत-संग्रह की अनिश्चितताओं को लेकर चिंताएँ बनी हुई हैं।

    अंतरिम सरकार ने कहा है कि सुरक्षा बल चुनाव को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराएंगे और किसी भी प्रकार की हिंसा या दबाव को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सरकार के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों और मानवाधिकार संगठनों को चुनाव निगरानी के लिए आमंत्रित किया गया है। अनुमान है कि यूरोपीय संघ और कॉमनवेल्थ सहित करीब 500 विदेशी पर्यवेक्षक मतदान प्रक्रिया पर नजर रखेंगे।

    मानवाधिकार और प्रेस स्वतंत्रता के आरोप

    शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद से देश में मानवाधिकार उल्लंघनों और अल्पसंख्यकों पर हमलों के आरोप भी सामने आए हैं। कुछ समूहों का दावा है कि अंतरिम प्रशासन नागरिक और राजनीतिक अधिकारों की पर्याप्त सुरक्षा नहीं कर पा रहा। आवामी लीग ने अपने कार्यकर्ताओं की मनमानी गिरफ्तारी और हिरासत में मौतों के आरोप लगाए हैं, जिन्हें सरकार ने खारिज किया है।

    इसके साथ ही प्रेस स्वतंत्रता को लेकर भी चिंता जताई गई है। कई पत्रकारों पर आपराधिक मामले दर्ज होने और प्रमुख अखबारों के दफ्तरों पर हमलों की खबरें सामने आई हैं।

    चुनावी मुकाबला: प्रमुख चेहरे और गठबंधन

    चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के नेता तारिक रहमान को प्रमुख दावेदार माना जा रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के पुत्र तारिक रहमान दिसंबर में 17 वर्षों के निर्वासन के बाद देश लौटे थे। उन्होंने देश में स्थिरता बहाल करने का वादा किया है।

    उनके सामने 11 दलों के गठबंधन की चुनौती है, जिसका नेतृत्व इस्लामी पार्टी जमात-ए-इस्लामी कर रही है। शेख हसीना के कार्यकाल में जमात-ए-इस्लामी पर कड़ा दबाव था और उसके शीर्ष नेताओं को 1971 के युद्ध से जुड़े मामलों में सजा मिली थी।

    उल्लेखनीय है कि BNP ने 2014 और 2024 के चुनावों का बहिष्कार किया था, जबकि 2018 में भाग लेने के बाद उसने चुनावों में धांधली के आरोप लगाए थे।

    “घाव भरने के लिए वैध सरकार जरूरी”

    शेख हसीना ने यह भी स्वीकार किया कि उनके शासनकाल में कुछ चुनाव पूरी तरह सहभागी नहीं थे, क्योंकि कई दलों ने बहिष्कार का रास्ता चुना। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश को अब राजनीतिक प्रतिबंधों और बहिष्कारों के दुष्चक्र से बाहर निकलना होगा।

    उनका कहना था, “देश को ऐसी सरकार चाहिए जिसे जनता की वास्तविक सहमति प्राप्त हो। यही रास्ता है जिससे राष्ट्र अपने घाव भर सकता है।” उन्होंने अपने खिलाफ दिए गए मृत्युदंड को “कंगारू कोर्ट” का फैसला बताते हुए उसकी निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए, जिन पर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने पहले ही चिंता जताई है।

     

    आने वाले हफ्तों में चुनावी सरगर्मी और तेज होने की संभावना है। शेख हसीना के आरोपों और अंतरिम सरकार के आश्वासनों के बीच बांग्लादेश का यह चुनाव न केवल सत्ता परिवर्तन, बल्कि देश की लोकतांत्रिक दिशा तय करने वाला साबित हो सकता है।

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