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    अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में रूस प्रतिबंध विधेयक आगे बढ़ा, भारत समेत देशों पर 100% तक टैरिफ का रास्ता खुल सकता है

    1 hour ago

    Yugcharan News / 16-09-2026

    नई दिल्ली। रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के उद्देश्य से अमेरिका में लाया गया एक महत्वपूर्ण प्रतिबंध विधेयक प्रतिनिधि सभा में अगले चरण तक पहुंच गया है। इस विधेयक के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से ऊर्जा खरीदने वाले कुछ देशों के उत्पादों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है। भारत भी उन देशों में शामिल है जिन पर प्रस्तावित व्यवस्था का असर पड़ सकता है।

    अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने बुधवार को Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 को आगे बढ़ाने के पक्ष में 214-211 मतों से मतदान किया। यह मतदान विधेयक को अंतिम मंजूरी के लिए आगे ले जाने की प्रक्रिया का हिस्सा था। अब प्रतिनिधि सभा में विधेयक पर अंतिम मतदान होना है। रिपोर्टों के अनुसार, यदि सदन इसे पारित करता है तो इसे आगे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास हस्ताक्षर के लिए भेजा जा सकता है।

    हालांकि, मौजूदा स्थिति में भारत पर 100 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ लागू नहीं हुआ है। प्रस्तावित कानून राष्ट्रपति को कुछ परिस्थितियों में ऐसा टैरिफ लगाने का अधिकार देगा। इसलिए विधेयक का आगे बढ़ना और भारत पर वास्तव में टैरिफ लगना दो अलग-अलग घटनाएं हैं। यह अंतर व्यापार और आर्थिक प्रभाव को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

    रूस से तेल खरीद को लेकर भारत पर बढ़ सकता है दबाव

    भारत लंबे समय से रूस से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल की खरीद करता रहा है। वर्ष 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के बीच भारत ने रूसी तेल खरीदना जारी रखा। भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों और आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न देशों से तेल खरीद की नीति अपनाई है।

    अमेरिका और उसके सहयोगियों की ओर से रूस की ऊर्जा आय को सीमित करने के प्रयासों के बीच भारत की रूसी तेल खरीद लगातार अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय रही है। प्रस्तावित अमेरिकी कानून इसी व्यापक प्रतिबंध व्यवस्था का हिस्सा है।

    विधेयक का उद्देश्य रूस के ऊर्जा और वित्तीय क्षेत्र पर दबाव बढ़ाना है। इसमें रूस के ऊर्जा क्षेत्र के साथ-साथ प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले जहाजों और अन्य नेटवर्क को निशाना बनाने के प्रावधान भी शामिल हैं।

    100 प्रतिशत तक टैरिफ का प्रावधान

    विधेयक अमेरिकी प्रशासन को रूस से बड़ी मात्रा में तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने का अधिकार दे सकता है। सीनेट से पारित मूल व्यवस्था में रूस के तेल और गैस के पांच सबसे बड़े खरीदारों को इस तरह के प्रावधान के दायरे में लाने की बात कही गई है।

    अमेरिकी संसद में विचार के दौरान कुछ संशोधनों के जरिए उन देशों का नाम स्पष्ट रूप से सामने आया है जिन पर संभावित कार्रवाई हो सकती है। भारत के साथ चीन, तुर्किये, अजरबैजान, हंगरी, स्लोवाकिया, संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, कजाकिस्तान और किर्गिस्तान जैसे देशों के नाम भी चर्चा में आए हैं।

    हालांकि, अंतिम टैरिफ दर अपने आप 100 प्रतिशत तय नहीं हो जाती। कानून पारित होने के बाद अमेरिकी प्रशासन के पास यह तय करने की शक्ति होगी कि किन देशों पर और किस स्तर का शुल्क लगाया जाए। इसलिए वर्तमान में इसे भारत पर लगाया गया टैरिफ बताना सही नहीं होगा।

    सीनेट में पहले ही पारित हो चुका है विधेयक

    रूस प्रतिबंध विधेयक को अमेरिकी सीनेट पहले ही भारी बहुमत से पारित कर चुकी है। अगस्त में सीनेट में मतदान के दौरान विधेयक को 86-11 मतों से मंजूरी मिली थी। इसके बाद अब प्रतिनिधि सभा में इसकी प्रक्रिया आगे बढ़ी है।

    विधेयक का नाम दिवंगत अमेरिकी सीनेटर Lindsey O. Graham के नाम पर रखा गया है। Graham रूस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाने के समर्थकों में रहे थे और रूस से कारोबार करने वाले तीसरे देशों पर भी दबाव बढ़ाने की व्यवस्था के पक्ष में थे।

    विधेयक में रूस की सरकार, ऊर्जा क्षेत्र, वित्तीय संस्थानों और उन जहाजों के खिलाफ प्रतिबंधों को मजबूत करने के प्रावधान हैं जिनका इस्तेमाल प्रतिबंधों से बचने के लिए किया जाता है। इसके अतिरिक्त ईरान से जुड़े मौजूदा प्रतिबंधों को आगे बढ़ाने का प्रावधान भी इसमें शामिल है।

    अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में क्यों हुआ विरोध?

    प्रतिनिधि सभा में विधेयक को लेकर दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के भीतर अलग-अलग चिंताएं सामने आई हैं। कुछ डेमोक्रेट सांसदों ने राष्ट्रपति को व्यापक टैरिफ अधिकार दिए जाने पर आपत्ति जताई है। उनका तर्क है कि इससे कार्यपालिका के पास व्यापारिक साझेदार देशों के खिलाफ शुल्क लगाने की काफी व्यापक शक्ति आ सकती है।

    वहीं कुछ रिपब्लिकन सांसदों ने भी प्रस्तावित व्यवस्था के संभावित आर्थिक प्रभाव को लेकर सवाल उठाए हैं। विशेष रूप से यह चिंता सामने आई है कि यदि रूस से जुड़े देशों पर बड़े पैमाने पर टैरिफ लगाए जाते हैं तो वैश्विक ऊर्जा बाजार और अमेरिकी उपभोक्ताओं पर भी अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है।

    इस प्रकार विधेयक पर बहस केवल रूस पर दबाव बढ़ाने तक सीमित नहीं है। अमेरिकी सांसदों के बीच राष्ट्रपति के व्यापारिक अधिकार, ऊर्जा कीमतों और प्रतिबंध नीति के व्यापक आर्थिक प्रभाव को लेकर भी मतभेद हैं।

    भारत के लिए क्या हो सकता है असर?

    भारत के लिए इस विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण पहलू अमेरिकी बाजार तक पहुंच से जुड़ा है। यदि भविष्य में अमेरिकी प्रशासन कानून के तहत भारत पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का निर्णय करता है, तो भारत से अमेरिका भेजे जाने वाले सामान की लागत बढ़ सकती है।

    ऐसी स्थिति में भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में अपने उत्पादों की कीमत और प्रतिस्पर्धा से जुड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। इसका प्रभाव अलग-अलग क्षेत्रों पर अलग-अलग हो सकता है और यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिकी प्रशासन किस प्रकार के उत्पादों और कितनी दरों पर शुल्क लागू करता है।

    हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत के पूरे अमेरिकी निर्यात पर 100 प्रतिशत शुल्क लग जाएगा। प्रस्तावित कानून केवल ऐसी कार्रवाई के लिए अधिकार और व्यवस्था उपलब्ध कराता है। अंतिम निर्णय अमेरिकी प्रशासन और कानून के लागू होने के बाद निर्धारित प्रक्रियाओं पर निर्भर करेगा।

    भारत-रूस ऊर्जा संबंधों का संदर्भ

    भारत और रूस के बीच ऊर्जा संबंध कई दशकों पुराने हैं। रूस से कच्चे तेल की खरीद में वृद्धि विशेष रूप से 2022 के बाद देखने को मिली, जब पश्चिमी देशों ने रूस पर व्यापक प्रतिबंध लगाए और वैश्विक ऊर्जा व्यापार की दिशा में बदलाव आया।

    भारत ने कई मौकों पर अपनी ऊर्जा सुरक्षा को अपनी आर्थिक नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया है। देश की बड़ी आबादी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के कारण कच्चे तेल की जरूरत काफी अधिक है। ऐसे में रूस से मिलने वाले तेल की कीमत, उपलब्धता और आपूर्ति व्यवस्था भारतीय ऊर्जा बाजार के लिए महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।

    अमेरिका का प्रस्तावित कानून इसी व्यापारिक संबंध पर अप्रत्यक्ष दबाव डालने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। अमेरिकी नीति का उद्देश्य रूस की ऊर्जा बिक्री से होने वाली आय को कम करना है, जबकि भारत की ओर से ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक हितों को ध्यान में रखकर तेल आयात जारी रखा गया है।

    क्या भारत पर तुरंत लगेगा 100 प्रतिशत शुल्क?

    नहीं। मौजूदा स्थिति में भारत पर ऐसा कोई नया 100 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ स्वतः लागू नहीं हुआ है। अभी विधेयक अमेरिकी कांग्रेस की प्रक्रिया में है। प्रतिनिधि सभा में अंतिम मतदान और उसके बाद की विधायी प्रक्रिया पूरी होना बाकी है।

    यदि प्रतिनिधि सभा विधेयक को पारित करती है और वह कानून बनता है, तब भी भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ अपने आप लागू नहीं होगा। कानून राष्ट्रपति को कुछ परिस्थितियों में इस तरह का शुल्क लगाने का अधिकार देगा। इसके बाद अमेरिकी प्रशासन द्वारा अलग से निर्णय लिया जा सकता है।

    इसलिए भारतीय उद्योग और निर्यात क्षेत्र के लिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में विधेयक की प्रगति और आगे होने वाला अंतिम मतदान है।

    आगे की प्रक्रिया पर नजर

    अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में प्रक्रिया आगे बढ़ने के बाद अब विधेयक का अंतिम मतदान महत्वपूर्ण होगा। यदि इसे सदन से मंजूरी मिलती है तो इसके बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजे जाने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।

    भारत के लिए आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि अंतिम कानून में कौन-कौन से प्रावधान शामिल रहते हैं और अमेरिकी प्रशासन उनका इस्तेमाल किस तरह करता है। साथ ही, भारत और अमेरिका के बीच व्यापार एवं आर्थिक संबंधों में होने वाली आगे की बातचीत भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

     

    फिलहाल इतना स्पष्ट है कि अमेरिकी कांग्रेस में रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर दबाव बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण विधायी कदम आगे बढ़ा है। भारत का नाम संभावित प्रभावित देशों में आने से यह मामला नई दिल्ली के लिए भी महत्वपूर्ण हो गया है। हालांकि, 100 प्रतिशत टैरिफ अभी लागू नहीं हुआ है और अंतिम प्रभाव कानून के अंतिम स्वरूप तथा अमेरिकी प्रशासन द्वारा लिए जाने वाले भविष्य के निर्णयों पर निर्भर करेगा।

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