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    केरल में मंदिर पुजारियों की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट की नोटिस, हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती की जांच

    1 hour ago

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केरल हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने का निर्णय लिया, जिसमें कहा गया था कि मंदिरों में पुजारियों की नियुक्ति धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं के अनुरूप ही की जानी चाहिए। शीर्ष अदालत ने इस मामले में केरल सरकार, त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (TDB) और केरल देवस्वोम भर्ती बोर्ड (KDRB) को नोटिस जारी कर उनसे जवाब मांगा है।

    न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ ने प्रारंभिक सुनवाई के दौरान कहा कि याचिका में उठाए गए संवैधानिक और कानूनी प्रश्नों की गहन जांच आवश्यक है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला धार्मिक संस्थानों में नियुक्ति प्रक्रिया, परंपरा और संवैधानिक प्रावधानों के संतुलन से जुड़ा है, जिस पर विचार किया जाना जरूरी है।

    याचिका का आधार

    यह याचिका अखिला केरल थंथ्री समाजम और उसके एक पदाधिकारी द्वारा दायर की गई है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि केरल हाईकोर्ट ने गलत रूप से उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड या केरल देवस्वोम भर्ती बोर्ड द्वारा मान्यता प्राप्त थंथ्र विद्याालयों से जारी प्रमाणपत्रों को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई थी।

    याचिकाकर्ताओं का कहना है कि पुजारी जैसे पदों के लिए केवल औपचारिक शैक्षणिक या तकनीकी मानदंड पर्याप्त नहीं हो सकते। उनके अनुसार, इन पदों पर नियुक्ति के लिए आध्यात्मिक परंपरा, धार्मिक प्रशिक्षण और शास्त्रीय ज्ञान का विशेष महत्व है। उन्होंने यह भी आशंका जताई कि मौजूदा व्यवस्था के तहत ऐसे व्यक्तियों पर भी विचार किया जा सकता है, जिनका मंदिर की आध्यात्मिक परंपराओं से प्रत्यक्ष संबंध नहीं रहा है।

    हाईकोर्ट का रुख

    केरल हाईकोर्ट ने इस मामले में पहले याचिका को खारिज करते हुए कहा था कि यह तर्क स्वीकार्य नहीं है कि आध्यात्मिक कार्यों से असंबंधित लोगों को पुजारी पद के लिए चुना जा रहा है। हाईकोर्ट ने माना था कि त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड द्वारा अंशकालिक ‘सांथी’ (पुजारी) पद के लिए तय की गई योग्यताएं विशेषज्ञों से विचार-विमर्श के बाद बनाई गई हैं।

    हाईकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया था कि इन योग्यताओं को तैयार करने में केरल देवस्वोम भर्ती बोर्ड से इनपुट लिया गया और बाद में राज्य सरकार से इन्हें स्वीकृति भी मिली। अदालत के अनुसार, नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और प्रशासनिक नियमों का पालन किया गया है।

    सुप्रीम कोर्ट में उठे सवाल

    सुप्रीम कोर्ट में अब यह प्रश्न केंद्र में है कि क्या धार्मिक संस्थानों में नियुक्ति प्रक्रिया पूरी तरह परंपरागत धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं पर आधारित होनी चाहिए, या फिर राज्य द्वारा निर्धारित मानकों और संवैधानिक सिद्धांतों के अनुसार इसमें सुधार संभव है। यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता, समान अवसर और राज्य की भूमिका जैसे व्यापक संवैधानिक मुद्दों से भी जुड़ा माना जा रहा है।

    अदालत ने संकेत दिया कि वह यह भी देखेगी कि क्या मौजूदा व्यवस्था धार्मिक संस्थानों की स्वायत्तता और संविधान के तहत प्रदत्त अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखती है या नहीं।

    आगे की कार्यवाही

    नोटिस जारी होने के बाद अब केरल सरकार, त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड और केरल देवस्वोम भर्ती बोर्ड को अपना पक्ष सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखना होगा। इसके बाद अदालत इस मामले में विस्तृत सुनवाई करेगी।

     

    कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले का असर केवल केरल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देशभर में मंदिरों और अन्य धार्मिक संस्थानों में नियुक्ति से जुड़े नियमों और प्रक्रियाओं पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।

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