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    ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’: पाकिस्तान की एंट्री, इज़राइल की नाराज़गी और भारत की खामोशी कहानी यहीं खत्म नहीं होती

    4 days ago

    दुनिया की राजनीति में कुछ ख़बरें ऐसी होती हैं जो पहली नज़र में साधारण लगती हैं, लेकिन उनके मायने बहुत गहरे होते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा बनाए गए बोर्ड ऑफ पीस’ में पाकिस्तान को शामिल किए जाने की ख़बर भी ऐसी ही है। नाम भले ही शांति का हो, लेकिन इस फैसले ने इज़राइल से लेकर भारत तक कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

     

    बोर्ड ऑफ पीस नाम शांति का, राजनीति पूरी

    डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि यह बोर्ड उन इलाक़ों में स्थिरता और स्थायी शांति लाने के लिए बनाया गया है जो लंबे समय से संघर्ष झेल रहे हैं। इसकी शुरुआत ग़ाज़ा से होगी और बाद में इसे दुनिया के दूसरे हिस्सों तक ले जाया जाएगा।

    सुनने में यह विचार बहुत अच्छा लगता है, लेकिन असली सवाल यही है शांति के नियम कौन तय करेगा और किसके भरोसे पर?

    इस बोर्ड में सबसे ज़्यादा अधिकार खुद ट्रंप के पास हैं। अध्यक्ष होने के नाते वे यह तय करेंगे कि कौन शामिल होगा, कौन बाहर रहेगा और यह मंच किस दिशा में आगे बढ़ेगा।

     

    पाकिस्तान की एंट्री: महज़ संयोग नहीं, एक साफ़ संदेश

    जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ट्रंप के साथ मंच पर दिखाई दिए, तो यह सिर्फ़ एक तस्वीर नहीं थी। यह एक साफ़ संदेश था कि पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में फिर से जगह दी जा रही है।

    यही बात भारत को असहज करती है। भारत लंबे समय से यह मुद्दा उठाता रहा है कि पाकिस्तान की ज़मीन से आतंकवाद को बढ़ावा मिलता है। जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुआ हमला आज भी याद दिलाता है कि यह सिर्फ़ आरोप नहीं, बल्कि एक कड़वी हक़ीक़त है।

     

    इज़राइल का दो-टूक जवाब: भरोसे की सबसे बड़ी कमी

    पाकिस्तान को बोर्ड में शामिल किए जाने पर सबसे कड़ा विरोध इज़राइल की तरफ़ से आया। भारत में इज़राइल के राजदूत ने साफ़ कहा कि ग़ाज़ा से जुड़ी किसी भी ज़मीनी योजना में पाकिस्तानी सेना की भागीदारी क़बूल नहीं की जा सकती।

    इज़राइल की चिंता सीधी और स्पष्ट है हमास और पाकिस्तान से जुड़े आतंकी संगठनों, ख़ासकर लश्कर-ए-तैयबा, के बीच रिश्तों को लेकर। इज़राइल के मंत्रियों का कहना है कि जिस देश पर भरोसा न हो, उसके साथ शांति की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई जा सकती।

     

    भारत की चुप्पी: कमजोरी नहीं, समझदारी

    इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज़्यादा ध्यान भारत की चुप्पी ने खींचा है। भारत को भी इस बोर्ड में शामिल होने का न्योता मिला है, लेकिन नई दिल्ली ने अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी।

    यह चुप्पी किसी दबाव का नतीजा नहीं लगती, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है। भारत जानता है कि ऐसे मंच का हिस्सा बनना सिर्फ़ बैठक में बैठना नहीं, बल्कि उन देशों के साथ खड़ा होना भी है जिनकी नीयत पर सवाल उठते रहे हैं।

     

    कौन शामिल है और कौन बाहर?

    इस बोर्ड में अमेरिका, पाकिस्तान और सऊदी अरब के अलावा अर्जेंटीना, इंडोनेशिया, पराग्वे, उज़्बेकिस्तान, आर्मेनिया और अज़रबैजान जैसे देश शामिल हैं।
    हंगरी के प्रधानमंत्री और इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भी इसका हिस्सा हैं।

    लेकिन फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, रूस और चीन जैसे बड़े देशों की गैरमौजूदगी इस पहल की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करती है।

     

     

     

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