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    मन्त्र-तन्त्र विज्ञान को आधुनिक चिकित्सा एवं मानसिक स्वास्थ्य से जोड़ने की आवश्यकता प्रो. मदन मोहन झा राजस्थान मन्त्र प्रतिष्ठान की राष्ट्रीय कार्यशाला सम्पन्न तनाव प्रबंधन,

    1 hour ago

     पाण्डुलिपि संरक्षण एवं नवीन पाठ्यक्रमों पर हुआ गहन मंथन

    जयपुर। जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के राजस्थान मन्त्र प्रतिष्ठान द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला “मन्त्र-तन्त्र-यन्त्र : प्रयोग एवं विश्लेषण” का सफलतापूर्वक समापन हुआ। कार्यशाला में देशभर से आए विद्वानों, शोधकर्ताओं एवं विषय विशेषज्ञों ने मन्त्र, तन्त्र एवं यन्त्र विज्ञान के विविध आयामों पर गहन विचार-विमर्श किया।

    राजस्थान मन्त्र प्रतिष्ठान के निदेशक डॉ. कुलदीप पालावत ने बताया कि कार्यशाला के दूसरे दिन तनाव प्रबंधन, चित्तशुद्धि, राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020, आधुनिक चिकित्सा, आयुर्वेद, पाण्डुलिपि संरक्षण तथा डिजिटल लेखन जैसे समसामयिक एवं व्यावहारिक विषयों पर विस्तृत चर्चा हुई।

    तन्त्र का व्यावहारिक एवं चिकित्सकीय पक्ष

    प्रथम तकनीकी सत्र का विषय प्रवर्तन एवं संचालन डॉ. कैलाशचन्द्र शर्मा ने किया। सत्र के प्रथम उप-विषय “तन्त्र परम्परा का प्रामाणिक स्वरूप आध्यात्मिक एवं मानसिक स्वास्थ्य प्रबंधन” की अध्यक्षता प्रो. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा ने की तथा मुख्य परामर्शक प्रो. सुन्दरनारायण झा रहे। इस अवसर पर तन्त्र परम्परा के आध्यात्मिक, मानसिक एवं सामाजिक पक्षों पर विस्तार से विचार व्यक्त किए गए।

    द्वितीय उप-विषय “तनाव प्रबंधन, चित्तशुद्धि एवं ऊर्जा रूपान्तरण में तन्त्र का व्यावहारिक प्रयोग” पर आयोजित चर्चा की अध्यक्षता प्रो. कमलेश कुमार शर्मा ने की तथा मुख्य परामर्शक डॉ. रघुवीर सिंह रहे। वक्ताओं ने बताया कि तन्त्र की प्राचीन पद्धतियाँ आधुनिक जीवन में बढ़ते तनाव, मानसिक असंतुलन एवं ऊर्जा प्रबंधन की चुनौतियों के समाधान में सहायक सिद्ध हो सकती हैं। भारतीय ज्ञान परम्परा एवं डिजिटल लेखन पर विमर्श

    द्वितीय सत्र का विषय प्रवर्तन एवं संचालन डॉ. शशि कुमार शर्मा द्वारा किया गया। सत्र के अंतर्गत “दुर्लभ पाण्डुलिपियों का संरक्षण एवं डिजिटलीकरण” विषय पर प्रो. बीना अग्रवाल की अध्यक्षता तथा डॉ. रणजीत झा के मुख्य परामर्श में विस्तृत चर्चा हुई। वक्ताओं ने भारतीय ज्ञान परम्परा के अमूल्य ग्रन्थों को आधुनिक तकनीक के माध्यम से सुरक्षित रखने तथा उनके डिजिटलीकरण की आवश्यकता पर बल दिया।

    इसी सत्र में “राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुरूप प्रमाणपत्र एवं डिप्लोमा पाठ्यक्रमों की रूपरेखा” विषय पर प्रो. सत्यप्रकाश दुबे की अध्यक्षता एवं प्रो. लम्बोदर मिश्र के मुख्य परामर्श में विचार-विमर्श हुआ। इस दौरान मन्त्र, तन्त्र एवं यन्त्र विज्ञान को रोजगारोन्मुखी प्रमाणपत्र एवं डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के रूप में विकसित करने की संभावनाओं पर चर्चा की गई।

    इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. मदन मोहन झा ने अपने उद्बोधन में कहा कि मन्त्र एवं तन्त्र विज्ञान को केवल परम्परागत आस्था के दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसके वैज्ञानिक, चिकित्सकीय तथा मानसिक स्वास्थ्य संबंधी आयामों पर भी गंभीर शोध एवं अध्ययन की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान, आयुर्वेद एवं भारतीय ज्ञान परम्परा के समन्वय से समाज को नई दिशा प्रदान की जा सकती है। उन्होंने कार्यशाला में प्रस्तुत विचारों एवं निष्कर्षों को भविष्य की शोध योजनाओं तथा शैक्षणिक गतिविधियों के लिए अत्यंत उपयोगी बताया।

    योजनाओं के क्रियान्वयन हेतु तैयार हुआ रोडमैप

    दोपहर बाद आयोजित तृतीय सत्र “योजना क्रियान्वयन मंत्रणा” का संचालन डॉ. मधुबाला शर्मा ने किया। श्रीकृष्ण शर्मा की अध्यक्षता तथा प्रो. उपेन्द्र कुमार त्रिपाठी के मुख्य परामर्श में कार्यशाला से प्राप्त निष्कर्षों एवं सुझावों को व्यवहारिक स्तर पर लागू करने के लिए विस्तृत कार्ययोजना एवं रोडमैप तैयार किया गया।

    कार्यशाला में प्रो. सुरेन्द्र कुमार शर्मा, प्रो. मोहनलाल शर्मा, डॉ.राजधर मिश्र, डॉ हेमन्त कृष्ण मिश्र सहित देशभर से आए विद्वानों, शोधार्थियों एवं विषय विशेषज्ञों की सक्रिय सहभागिता रही। सभी प्रतिभागियों ने कार्यशाला को भारतीय ज्ञान परम्परा के वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक पक्षों को समाज के समक्ष प्रस्तुत करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया।

    कार्यक्रम के अंत में विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. गुंजन सोनी ने सभी विद्वानों, प्रतिभागियों एवं आयोजकों का आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया।

     

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