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    गांधी का कोई विकल्प नहीं - प्रो. विजयलक्ष्मी मोहन्ती

    2 hours ago

    गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय के गांधीवादी विचार एवं शांति अध्ययन विभाग एवं भारतीय गांधी अध्ययन परिषद के संयुक्त तत्वावधान में भारतीय समाज विज्ञान परिषद नई दिल्ली द्वारा संपोषित तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन सीमाओं से परे गाँधीरू वैश्विक परिदृश्य में गाँधीवादी विचारों की प्रासंगिकता विषय पर किया गया । इस सम्मेलन के समापन समारोह में भारत के राष्ट्रपति की सलाहकार प्रो. विजयलक्ष्मी मोहन्ती ने मुख्य अतिथि के रूप में विचार व्यक्त करते हुए कहा कि महात्मा गांधी के विचारों और महर्षि पतंजलि के योगसूत्रों के बीच गहरे दार्शनिक एवं व्यावहारिक संबंधों को रेखांकित करते हुए प्रसिद्ध शिक्षाविद् एवं चिंतक प्रो. डॉ. विजया लक्ष्मी मोहंती ने कहा कि गांधीजी ने योग के नैतिक एवं आध्यात्मिक सिद्धांतों को सामाजिक परिवर्तन, नैतिक नेतृत्व और राष्ट्र निर्माण का प्रभावी माध्यम बनाया। उन्होंने कहा कि गांधीजी के एकादश व्रत पतंजलि के यम और नियम के सिद्धांतों से गहरे रूप से जुड़े हुए हैं। अपने व्याख्यान “गांधीवादी सिद्धांतों पर पतंजलि योगसूत्रों का प्रभाव : एक दार्शनिक एवं व्यावहारिक विवेचन” विषय पर बोलते हुए प्रो. मोहंती ने बताया कि अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अस्तेय और अपरिग्रह जैसे योगिक मूल्यों को गांधीजी ने अपने व्यक्तिगत जीवन के साथ-साथ स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक सुधार अभियानों का आधार बनाया। उन्होंने कहा कि गांधीजी ने योग को केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे सामाजिक न्याय, शांति और मानवीय मूल्यों की स्थापना का साधन बनाया। उन्होंने कहा कि आज के समय में बढ़ते तनाव, हिंसा, उपभोक्तावाद और पर्यावरणीय संकट के समाधान के लिए गांधीवादी-योगिक चिंतन अत्यंत प्रासंगिक है। मानसिक स्वास्थ्य, सतत विकास, नैतिक शासन और सामाजिक सद्भाव जैसे क्षेत्रों में गांधी और पतंजलि के विचार नई दिशा प्रदान कर सकते हैं। व्याख्यान में यह भी बताया गया कि गांधीजी का मौन, प्रार्थना, आत्मचिंतन, उपवास और सादगीपूर्ण जीवन योग के उच्चतर अंगों—प्रत्याहार, धारणा और ध्यान—की व्यावहारिक अभिव्यक्ति थे। गांधीजी का ‘सर्वोदय’ का आदर्श तथा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना योग दर्शन की सार्वभौमिक चेतना का ही विस्तार है। कार्यक्रम के अंत में वक्ता ने कहा कि गांधी और पतंजलि का समन्वित दृष्टिकोण भारतीय ज्ञान परंपरा की अमूल्य धरोहर है, जो वर्तमान वैश्विक चुनौतियों के बीच मानवता को शांति, नैतिकता और समरसता का मार्ग दिखा सकता है।

     

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