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    CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक अवमानना कार्रवाई की मांग, सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की कथित अवहेलना का आरोप

    3 hours ago

     
     

    Yugcharan News / 24-09-2026

    सुप्रीम कोर्ट के एक अधिवक्ता ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कथित तौर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का जानबूझकर पालन नहीं करने के आरोप में आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की अनुमति मांगी है। इसके लिए अधिवक्ता बृजेश सिंह ने 24 सितंबर को भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी को पत्र भेजकर आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए उनकी सहमति मांगी है।

    सिंह ने अपने पत्र में अवमानना अदालत अधिनियम, 1971 की धारा 15(1)(b) के साथ धारा 2(c) और सुप्रीम कोर्ट की अवमानना कार्यवाही को नियंत्रित करने वाले 1975 के नियमों के नियम 3 का हवाला दिया है। उनका आरोप है कि निर्वाचन आयोग के कामकाज से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के स्थापित फैसलों के अनुरूप आयोग की बहुसदस्यीय संरचना में निर्णय लेने की प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।

    यह मांग ऐसे समय सामने आई है जब निर्वाचन आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया और चुनावी व्यवस्था से जुड़े कुछ प्रशासनिक मुद्दों को लेकर सार्वजनिक चर्चा तेज हुई है। इस पूरे विवाद का आधार मुख्य रूप से 23 सितंबर को प्रकाशित द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट है, जिसमें दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 मौकों पर ऐसे फैसलों पर आपत्ति दर्ज कराई थी, जिनके बारे में उनका कहना था कि वे उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना लिए गए।

    चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों का मामला

    इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां कई प्रशासनिक और चुनावी प्रक्रियाओं से जुड़े विषयों पर थीं। इनमें मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 में बदलाव, मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया तथा चुनावी मतदाता डेटा के केंद्रीकरण से संबंधित मुद्दे शामिल बताए गए।

    अधिवक्ता बृजेश सिंह ने अपने पत्र में इन रिपोर्टेड घटनाओं का उल्लेख करते हुए दावा किया है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ फैसलों को कथित तौर पर “अनधिकृत” और “अवैध” बताया था। उनके अनुसार, यदि रिपोर्ट में सामने आए तथ्य सही हैं, तो यह सवाल उठता है कि क्या निर्वाचन आयोग ने संविधान के तहत निर्धारित अपनी बहुसदस्यीय संस्था के रूप में काम किया।

    हालांकि, निर्वाचन आयोग ने इस रिपोर्ट में आयोग के भीतर मतभेद या किसी तरह की दरार के संकेत से इनकार किया है। आयोग की ओर से कहा गया कि संबंधित मुद्दे मसौदा स्तर पर उठाए गए परिचालन संबंधी सवाल, सुझाव और इनपुट थे तथा आयोग द्वारा लिए गए अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।

    इसलिए इस मामले में आरोप और निर्वाचन आयोग की प्रतिक्रिया को अलग-अलग समझना महत्वपूर्ण है। अधिवक्ता द्वारा अवमानना कार्रवाई की मांग किया जाना अपने आप में यह स्थापित नहीं करता कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना हुई है। इस संबंध में आगे की प्रक्रिया अटॉर्नी जनरल की सहमति और उसके बाद न्यायिक विचार पर निर्भर करेगी।

    टी.एन. शेषन फैसले का दिया गया हवाला

    अधिवक्ता बृजेश सिंह ने अपनी मांग के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ का भी उल्लेख किया है। इस फैसले का संबंध निर्वाचन आयोग की बहुसदस्यीय प्रकृति और मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच संस्थागत भूमिका से है।

    सिंह का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के अनुसार निर्वाचन आयोग को एक बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था के रूप में काम करना चाहिए। उनके अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को आयोग का पूर्ण या सर्वोच्च अधिकार रखने वाला सदस्य नहीं माना जा सकता, बल्कि वह अन्य चुनाव आयुक्तों के साथ संस्थागत रूप से काम करने वाली व्यवस्था का हिस्सा है।

    उन्होंने प्राइमस इंटर पारेस की अवधारणा का भी उल्लेख किया है, जिसका अर्थ है—समानों में प्रथम। सिंह के अनुसार, इसका मतलब यह है कि मुख्य चुनाव आयुक्त आयोग में महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं, लेकिन उन्हें अन्य चुनाव आयुक्तों से ऊपर एकतरफा निर्णय लेने वाली संस्था के रूप में नहीं देखा जा सकता।

    सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसलों में यह स्पष्ट किया है कि बहुसदस्यीय निर्वाचन आयोग के फैसले आयोग के फैसले होते हैं और उन्हें केवल उसके अध्यक्ष या प्रमुख सदस्य के व्यक्तिगत फैसले के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

    अनूप बरनवाल मामले का भी उल्लेख

    अवमानना की मांग में 2023 के सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ का भी हवाला दिया गया है। यह मामला मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े संवैधानिक ढांचे तथा निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता से संबंधित था।

    सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्वतंत्र निर्वाचन आयोग के महत्व पर जोर दिया था और चुनाव कराने वाली संस्था को निष्पक्ष, पारदर्शी और स्वतंत्र तरीके से काम करने की संवैधानिक जिम्मेदारी से जोड़ा था।

    बृजेश सिंह का आरोप है कि यदि निर्वाचन आयोग के किसी फैसले या आधिकारिक संचार को “पूर्ण आयोग” के नाम से जारी किया गया हो, जबकि उसमें सभी चुनाव आयुक्तों की भागीदारी या सहमति न रही हो, तो ऐसी कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून के विपरीत मानी जा सकती है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 141 का भी हवाला दिया है, जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून देश की सभी अदालतों पर बाध्यकारी होता है।

    हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि किसी विशेष प्रशासनिक कार्रवाई को अनुच्छेद 141 या किसी न्यायिक फैसले का उल्लंघन मानने का अंतिम निर्धारण संबंधित न्यायिक प्रक्रिया में ही हो सकता है।

    मतदाता डेटा और फॉर्म 6 को लेकर उठे सवाल

    अधिवक्ता की शिकायत में मतदाता सूची और चुनावी डेटा से संबंधित कथित बदलावों को भी महत्वपूर्ण आधार बनाया गया है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने चुनावी मतदाता डेटा तक पहुंच और उसके केंद्रीकरण से जुड़े कुछ मुद्दों पर चिंता जताई थी।

    रिपोर्ट में कथित तौर पर चुनावी रोल डेटाबेस के धीरे-धीरे केंद्रीकरण और वैधानिक चुनावी अधिकारियों की सिस्टम तक पहुंच को लेकर उठाई गई आपत्तियों का उल्लेख किया गया था।

    फॉर्म 6 में बदलाव का मुद्दा भी इसी संदर्भ में सामने आया। फॉर्म 6 का इस्तेमाल मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए किया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision से जुड़े सवालों को प्रक्रिया में शामिल किए जाने के बाद फॉर्म में किए गए बदलाव को लेकर भी आपत्ति दर्ज की गई थी।

    अधिवक्ता सिंह ने इन रिपोर्टों को निर्वाचन आयोग की संवैधानिक कार्यप्रणाली से जोड़ते हुए दावा किया है कि यदि आयोग के किसी सदस्य या सदस्यों ने अन्य सदस्यों की भागीदारी के बिना ऐसे महत्वपूर्ण फैसले लिए, तो यह केवल आंतरिक प्रशासनिक मामला नहीं रह जाता।

    दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग ने इस पूरे घटनाक्रम को अलग तरीके से प्रस्तुत किया है। आयोग ने कहा है कि संबंधित विषय निर्णय लेने से पहले के स्तर पर उठाए गए परिचालन संबंधी सवाल और सुझाव थे तथा अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।

    अटॉर्नी जनरल की सहमति के बाद आगे बढ़ सकती है प्रक्रिया

    अवमानना अधिनियम की धारा 15(1)(b) के तहत आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए संबंधित स्थिति में अटॉर्नी जनरल की लिखित सहमति आवश्यक होती है। इसलिए फिलहाल अधिवक्ता की ओर से की गई मांग को कार्यवाही शुरू होने के अंतिम चरण के रूप में नहीं देखा जा सकता।

    यदि अटॉर्नी जनरल की ओर से आवश्यक सहमति दी जाती है, तो इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का रास्ता खुल सकता है। उस स्थिति में न्यायालय यह देख सकता है कि लगाए गए आरोप कानून और उपलब्ध सामग्री के आधार पर अवमानना की कार्यवाही के लिए पर्याप्त हैं या नहीं।

    इस मामले में यह भी महत्वपूर्ण है कि वर्तमान आरोप अभी न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हुए हैं। अधिवक्ता की ओर से लगाए गए आरोप और निर्वाचन आयोग की ओर से दी गई सफाई दोनों ही इस विवाद का हिस्सा हैं। अंतिम कानूनी स्थिति संबंधित न्यायिक प्रक्रिया और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही निर्धारित होगी।

    चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

    यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़ा एक अन्य महत्वपूर्ण मामला भी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष है।

    23 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाले 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को बड़ी पीठ के पास भेज दिया था। इसी मामले में न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने अपनी अलग राय में मौजूदा चयन प्रक्रिया की स्वतंत्रता को लेकर प्रथमदृष्टया कुछ सवाल उठाए थे।

    इस व्यापक कानूनी पृष्ठभूमि में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्तावित अवमानना कार्रवाई की मांग निर्वाचन आयोग की संस्थागत कार्यप्रणाली, बहुसदस्यीय निर्णय प्रक्रिया और चुनावी संस्था की स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक सवालों को फिर चर्चा में ले आई है।

    फिलहाल, बृजेश सिंह की ओर से अटॉर्नी जनरल से सहमति मांगी गई है। आगे की कार्रवाई इस बात पर निर्भर करेगी कि अटॉर्नी जनरल इस अनुरोध पर क्या निर्णय लेते हैं और यदि सहमति मिलती है तो सुप्रीम कोर्ट इस मामले में प्रस्तुत सामग्री और आरोपों पर किस प्रकार विचार करता है।

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