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    हिमालय की ऊँचाइयों पर गूँजा संस्कृत का स्वर “हिमालयस्य शिखरे शिखरे संस्कृतम् संस्कृत की वाणी भारत के घर-घर में गूँजनी चाहिए कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी

    45 minutes ago

    केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के 51 सदस्यीय छात्र दल ने लिया भाग

    जयपुर ।

    केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, संस्कृत भारती, तरुणोदय संस्कृत सेवा संस्था (शिवमोग्गा), यूथ हॉस्टल्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया की तरुणोदय इकाई, शिवमोग्गा तथा गीर्वाण भारती इकाई, श्री आदिचुंचनगिरि क्षेत्र के संयुक्त तत्वावधान में हिमाचल प्रदेश की कुल्लू घाटी स्थित रोली-खोली हिमालय पर्वत पर रविवार, 31 मई 2026 को भव्य संस्कृत ध्वजारोहण समारोह का आयोजन किया गया। समुद्र तल से लगभग 12,000 फीट की ऊँचाई पर आयोजित इस समारोह में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के 51 सदस्यीय छात्र-छात्राओं के दल ने उत्साहपूर्वक सहभागिता करते हुए संस्कृत ध्वज फहराया तथा संस्कृत संवर्धन का संकल्प दोहराया। इस अवसर पर युवाओ द्वारा संस्कृत प्रचार के संकल्प को व्यक्त करते हुए यह प्रेरणादायी श्लोक भी प्रस्तुत किया गया “हिमाद्रौ तरुणाः सर्वे संस्कृतध्वजवाहकाः ।

    ज्ञानदीपं नयामोऽद्य भारतस्य नवोदितम् ॥”

    अर्थात् हिमालय की ऊँचाइयों पर खड़े युवा संस्कृत ध्वज के वाहक बनकर नवभारत के निर्माण हेतु ज्ञान का दीप प्रज्वलित कर रहे हैं।

    इस अवसर पर केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने अपने संदेश में कहा कि हिमालय की चोटियो से लेकर भारत के प्रत्येक घर तक संस्कृत की वाणी गूँजनी चाहिए। उन्होंने कहा कि कुल्लू-मनाली के निकट स्थित रमणीय रोली-खोली हिमालय पर्वत पर तीसरी बार संस्कृत ध्वजारोहण कार्यक्रम का सफल आयोजन अत्यंत हर्ष और गौरव का विषय है। उन्होंने कार्यक्रम के सभी आयोजकों, प्रतिभागियों एवं सहयोगियो को हार्दिक शुभकामनायें प्रेषित की ।

    कुलपति प्रो. वरखेड़ी ने कहा कि हिमालय के दिव्य वातावरण में संस्कृत ध्वज का फहराया जाना भारतीय संस्कृति के गौरव, वैभव और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक है। कार्यक्रम का मुख्य संदेश “हिमालयस्य शिखरे शिखरे संस्कृतम्, भारतस्य गेहे गेहे संस्कृतम्” रहा, जिसने हिमालय की ऊँचाइयों से संस्कृत के व्यापक प्रचार-प्रसार तथा भारतीय सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण का संदेश सम्पूर्ण राष्ट्र तक पहुँचाया। संस्कृत केवल एक प्राचीन भाषा नहीं, बल्कि विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक, तार्किक एवं सुव्यवस्थित भाषाओं में से एक है। इसका अध्ययन बाल्यावस्था से ही प्रारम्भ होना चाहिए, क्योंकि संस्कृत के अध्ययन से भाषाई दक्षता, तार्किक चिंतन, सांस्कृतिक चेतना तथा नैतिक मूल्यों का विकास होता है। छात्र कल्याण अधिष्ठात्री प्रो. लीना सक्करवाल ने कहा कि ऐसे साहसिक एवं प्रेरणादायी कार्यक्रम विद्यार्थियों के सर्वांगीण व्यक्तित्व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इससे विद्यार्थियों में आत्मविश्वास, अनुशासन, नेतृत्व क्षमता, तथा सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना का विकास होता है केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय विद्यार्थियों को शैक्षणिक उत्कृष्टता के साथ-साथ राष्ट्र निर्माण और सांस्कृतिक चेतना से जोड़ने के लिए निरंतर प्रयासरत है। ट्रेकिंग अभियान के समन्वयक डॉ. योगेन्द्र दीक्षित ने बताया कि इस हिमालयी ट्रेकिंग अभियान में विश्वविद्यालय के 12 परिसरों से 51 विद्यार्थियों ने भाग लिया है। इस अवसर पर केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर परिसर के क्रीड़ा सहायक निदेशक डॉ. राजेंद्र कुमार शर्मा, संस्कृत भारती एवं तरुणोदय संस्कृत सेवा संस्था के प्रमुख तथा ट्रेक समन्वयक ए. एन. विजयेन्द्र राव, यूथ हॉस्टल्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के ट्रेक संयोजक नवीन चंद्र तिवारी, टीम लीडर एम. के. ज्योति तथा रोली-खोली शिविर प्रमुख आदित्य सहित छात्र उपस्थित थे ।

     

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