Search

    Language Settings
    Select Website Language

    GDPR Compliance

    We use cookies to ensure you get the best experience on our website. By continuing to use our site, you accept our use of cookies, Privacy Policy, and Terms of Service.

    गुलामों की मंडी बन चुकी है सत्ता : नगर प्रमुख की कुर्सी की लड़ाई में राज ठाकरे का तीखा राजनीतिक विस्फोट

    4 days ago

    महाराष्ट्र की राजनीति में कभी-कभी कोई एक वाक्य पूरे तंत्र की सच्चाई सामने रख देता है। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे का यह बयान महाराष्ट्र की राजनीति अब गुलामों की मंडी बन गई है ऐसा ही एक वाक्य है।


    यह केवल नाराज़गी नहीं, बल्कि उस राजनीतिक सड़ांध की ओर इशारा है, जो हाल के नगर निकाय चुनावों के बाद खुलकर दिखाई दे रही है।यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब राज्य की राजनीति पदों की सौदेबाज़ी, जोड़-तोड़ और समर्थन के खेल में उलझ चुकी है।

     

    कल्याण डोंबिवली की जंग: जब कुर्सी ने रिश्तों की परीक्षा ले ली

    कल्याण डोंबिवली नगर पालिका इस समय सत्ता संघर्ष का केंद्र बनी हुई है। बहुमत का आँकड़ा बासठ है और उसे हासिल करने के लिए हर दल पूरी ताक़त लगा रहा है।

    इसी संघर्ष के बीच महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने ऐसा कदम उठाया, जिसने पूरे राजनीतिक समीकरण को उलट-पलट कर रख दिया।
    पार्टी ने वहाँ एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना को समर्थन दे दिया।

    यह वही शिवसेना है, जो लंबे समय तक उद्धव ठाकरे की सबसे बड़ी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रही है।

     

    अप्रत्याशित मोड़: विरोधियों को समर्थन, अपने ही खेमे में बेचैनी

    महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का यह फैसला कई स्तरों पर असहज करने वाला रहा।
    एक ओर ठाकरे परिवार का हालिया मेल-मिलाप, दूसरी ओर सत्ता की मजबूरी इन दोनों के टकराव ने राजनीति को और उलझा दिया।

    पार्टी का कहना है कि यह निर्णय कल्याण की स्थानीय इकाई ने लिया, लेकिन राजनीति में ऐसे “स्थानीय फैसले” अक्सर बड़े संकेतों की परछाईं होते हैं।

     

    यह स्थानीय निर्णय था: लेकिन घटनाक्रम कुछ और संकेत देता है

    महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नेता राजू पाटिल को शिवसेना सांसद श्रीकांत शिंदे के साथ बातचीत करते देखा गया। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में अटकलें तेज़ हो गईं।

    सूत्रों के अनुसार, इस घटनाक्रम से उद्धव ठाकरे काफ़ी नाराज़ थे। यहां तक चर्चा होने लगी कि राज ठाकरे शायद शिवसेना (उद्धव गुट) के कार्यक्रम में शामिल न हों।

    बीस वर्षों की दूरी और फिर साथ आने की कोशिश

    राज ठाकरे ने मंच से यह भी कहा कि शिवसेना छोड़कर अपनी अलग राह चुनना आसान नहीं था। उन्होंने माना कि बीते बीस वर्षों में उन्होंने भी बहुत कुछ सीखा और उद्धव ठाकरे ने भी।

    दो दशकों की दूरी के बाद ठाकरे परिवार का साथ आना और फिर महानगरपालिका चुनाव साथ लड़ना महाराष्ट्र की राजनीति में भावनात्मक रूप से बड़ा क्षण था।
    हालांकि सत्ता हाथ नहीं लगी, लेकिन मराठी बहुल इलाक़ों में इस गठबंधन को ज़ोरदार समर्थन मिला।



    Click here to Read More
    Previous Article
    किसानों, महिलाओं एवं श्रमिकों के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध है सरकार— सांसद श्रीमती मंजू शर्मा
    Next Article
    ईरान उथल-पुथल के सबसे ख़ूनी दौर में: पाँच हज़ार से ज़्यादा मौतें, इंटरनेट बंद और समुद्र में बढ़ती जंगी हलचल

    Related देश Updates:

    Are you sure? You want to delete this comment..! Remove Cancel

    Comments (0)

      Leave a comment